Wednesday, 1 June 2016

POETRY OF ANIL PANCHBHAI

                                                             कविता संग्रह
कारवां और मसीहा
लोगों का कारंवा ले जानेवालो
तुम दुनिया के मसीहा नहीं होते।
तुम्हे तुम्हारा पता नहीं है
खुद को गुमराह करनेवालो।
शब्दोंसे खेलनेवालों
तुम्हारी विचारधारा नहीं होती।
युगों से मज़धार में बहानेवालों को
दूसरा किनारा नसीब नहीं होता।
विचारों के महल बनानेवालों
तुम्हारा वह ठिकाणा नहीं होता।
इतिहास के पन्नों में पढ़ के देखो
खँडहर ही खँडहर नजर आते है।

अज्ञात सत्ता 
बरस बरस तू, इतना बरस तू
अब लोग कहेंगे, बस अब बरस ना तू।
लोग तुज़पर इलजाम लगा रहे है
उनसे तुमने दुशमनी कर ली है।
जंहा सूखा ही सूखा ही पड़ा था
कंही धरती ही धरती फटी थी।
रेगिस्तान में तू क्यों नहीं बरसता
हरियाली वंहा तू क्यूँ नहीं उगता
क्यूँ वहांके लोगोसे तू दुश्मनी करता है
जंहा बूंद बूंद पानी को लोग तरसते हैं।
बरस बरस तू इतना बरस तू
जब लोग कहेंगे बस अब बरस ना तू।
विज्ञान ने लोगोंको डरा दिया है
भविष्य में पीनेको पानी नहीं मिलेगा।
झुठला दे तू इस भविष्य वाणी को
विज्ञान से ऊपर तेरी 'अज्ञात सत्ता' है।
कोई जरुरी नहीं हर राज बेपर्दा हो
कई ऐसे राज है, जो राज रहे तो अच्छे है।
जो 'शुन्य ' है उसका कोई कारण नहीं होता
जो 'शांत ' है उसका कोई स्थान नहीं होता।
जो जिसे पकड़कर रखता है
वह उससे छूटता नहीं है
जो उसस से छूटता रहता है
फिर एक के बाद एक सब छूट जाता है।
इसका कोई माहिर नहीं है
न इसका कोई मसीहा है।
न इसकी कोई राह है
न इसकी कोई मंजिल है
मत पूछों ये क्या है.………………
बहुत युग बीत गए
इंसान अब बोअर हो गया है
अब ऐसा करिश्मा दिखा दे तू
दिन को भी तारे नजर आ जाये।
हाय तोबा मच जाये जिधर-उधर
परबानु बनाने वाले तोबा तोबा कर ले।

Thursday, 27 February 2014

THE NEW TRUTH OF INDIA DEMOCRACY POPULATION


                           भारतीय शासित आणि शोषित लोकांची समस्य़ा
भारताची एकूण लोकतांत्रिक जनसंख्या 125 करोड़ आहे।
125 करोड़ लोकसंख्या पैकी -----
                                   3 करोड़ ब्राह्मण आहेत।
                                   4 करोड़ क्षत्रिय आहेत।
                                   3 करोड़ वैश्य आहेत।
                                  20  करोड़ अश्पृश्य SC आहेत।
                                  15  करोड़ आदिवासी ST आहेत।
                                  50  करोड़ शूद्र OBC आहेत।
                                  20  करोड़ मुसलमान आहेत।
                                  10  करोड़  ख्रिस्तचीयन आहेत।
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                               125  करोड़
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(3)  125 करोड़ पैकी -- 60 करोड़ स्त्रियां गुलाम आहेत।
(4)    60  करोड़ पैकी -- 10 करोड़ स्त्रियां अश्पृश्य गुलाम SC आहेत।
                                    25 करोड़  स्त्रियां शूद्र गुलाम आहेत।
                                     7 करोड़ स्त्रियां आदिवासी गुलाम आहेत।
                                   10 करोड़ स्त्रियां मुसलमान गुलाम आहेत।
                                     5 करोड़ स्त्रियां ख्रिश्चयन गुलाम आहेत।
                                     3 करोड़ स्त्रियां ब्राह्मण, क्षत्रिय आणि वैश्य गुलाम आहेत।
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                                   60 करोड़  WOMEN ARE SLAVES IN INDIA.
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( 5) सवर्ण 
       (a) --20 प्रतिशत भारतीय पूंजीपति आहेत। हे 20 प्रतिशत पूंजीपति लोक भारताचे केंद्र सरकार आणि
               29 राज्य सरकारे चालवित आहेत।
      (b) -- ह्या 20 प्रतिशत पूंजीपति लोकांचे पार्लियामेंट, न्यायालय, प्रशासन आणि प्रसारण वर पूर्ण कब्जा
                आहे।
      (c) --ह्या 20 प्रतिशत पूंजीपति लोकांचे भारताच्या नैसर्गिक - प्राकृतिक खनिज सम्पति वर संपूर्ण  
              कब्ज़ा आहे।
      (d) -- ह्या 20 प्रतिशत पूंजीपति पैकी ब्राह्मण, क्षत्रिय आणि वैश्य लोक भारताच्या संपूर्ण सत्येवर
               कुण्डलीमारुन बसले आहेत।
      (e) -- ह्या पूंजीपतिंना भारताच्या लोकशाहिशी आणि त्याच्या संविधानशी काही लेन - देन नाही।
      (f) -- ह्या पूंजीपतिंना बाकी 80 टक्के भारतीय लोकांची पिळवणुक काढून त्यांना गुलाम करुन ठेवण्याची
                राजनीती आहे।
(6) आदिवासी 15 करोड़ आहेत। ते जंगलात राहतात।  ते भारताचे  सर्वात जास्त गरीब, भूखे - नंगे, 
              बेसहारा लोक आहेत।  त्यांचे केंद्र सरकार आणि राज्य सरकारांत कोणीच वाली - मसीहा नाही।
(7)  अश्पृश्य 
        (a) --अस्पृश्य लोकांची संख्या 20 करोड़ आहे। हे अस्पृश्य लोक 2500 हजार वर्षा पासून भारतात आजही
               गुलाम आहेत।
       (b) --मोगल सम्राज्यात अस्पृश्य लोक मुसलमान झाले।  आज भारतात जे मुसलमान लोकांची संख्यां
               दिसत आहेत त्यांचे वंशज अस्पृश्य होते। म्हणून हिन्दू समाज मुसलमानांचा द्वेष करतात।
               कारण हिन्दू समाज अस्पृशांचा 2500 हजार वर्षापासून द्वेष करतात।
       (c) --ब्रिटिश सम्राज्यात अश्पृश्य लोकांची ब्रिटिश सैन्यात भर्ती झाली म्हणून अस्पृश्य लोक ख्रिस्चन
               झाले। म्हणून हिन्दू समाज ख्रिस्चन लोकांचा द्वेष करतात।  कारण ख्रिस्चन समाज हा पूर्वीचा
               अश्पृश्य समाजाचा वंशज आहे।
(8) शूद्र
      (a) --शुद्र  लोकांची संख्या जवळपास 50 करोड़ आहे।
      (b) --सर्वच शुद्र मागासलेले नाही। त्यापैकी काही खुप श्रीमंत आणि दबंग आहेत। काही खुप गरीब आहेत ,
               काही भिखारी आहेत। परन्तु पुष्कळ जास्त अशिक्षित आहेत, त्यामुळे धर्मांध आहेत। त्यामुळे
               मागासलेले आहेत। ह्यांना आरक्षण नाही, कारण ह्यांचे scheduled अनुसूची नाही।
       (c) --शुद्रांना सोडूंन इतर समाज धर्मांध नाही, त्यामुळे शूद्र समाजाचा विकास झाला नाही, प्रगति झाली
                नाही।
       (d) --शूद्र समाज धर्मांध असल्यामुळे भारताची प्रगति आणि विकास होऊ शकत नाही।
       (e) --शूद्र समाज चातुर्वर्ण्य व्यवस्थाला मानतो, म्हणून हिन्दू धर्माचा महान रक्षक आहे। म्हणजे सवर्ण
                जाती, जसे ब्राह्मण, क्षत्रिय आणि वैश्य समाजांचे संरक्षक आहेत - सवर्ण जाती पूंजीपति आहेत।
        (f) --शूद्रांचा देवदूत ब्राह्मण आहे, म्हणून हा सर्व गड़बड़घोटाळा आहे। ह्या गड़बड़घोटाळ्या मुळे
                ब्राह्मण भारतावर शासन करीत आहेत।
        (g)--शूद्रांना जर खरच वाटत असेल कि भारत विश्वात सर्व श्रेष्ठ झाला पाहिजे, तर त्यांनी आपल्या
                पायावर उभे रह्वयास शिकले पाहिजे आणि सर्वात महत्वाची गोष्ट म्हणजे त्यांनी ब्राह्मणाचा
                साथ सोडला पाहिजे तरच शूद्र समाजाची प्रगति आणि विकास निश्चित आहे, हयात दुमत नाही।
(9)     हे गाठ बांधून ठेवा कि सवर्ण समाज आपल्या स्वतःच्या सामाजाची प्रगति करेल पण भारताच्या इतर 
          शूद्र, अश्पृश्य आणि आदिवासी समाजां ची कधीच प्रगति करणार नाही --कारण भारतावर सवर्णांच 
          शासन आहे। 
(10)    शूद्र म्हणजे OBC समाज ज्यांची भारतात सर्वात जास्त लोकसंख्या आहे, त्यांना जर वाटत असेल कि 
           त्यांचे भारतावर शासन पाहिजे तर त्यांनी SC आणि ST लोकांशी गठबंधन करावयास आवश्यक
           आहे, त्याशिवाय भारत देश आझाद होणार नाही। ही भविष्य वाणी लक्षात ठेवा।
        
           

Friday, 29 November 2013

CARWAN

                    कारवां 
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अनिल पंचभाई --मोबाईल न.. . 9676669465
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----आज जो हमें आंबेडकर का कारवां समजते  है,
     वे कभी हमें नाग-द्रविड़ का कारवां कहते थे।
----इन्ही द्रविड़-नागों का एक जम्बूद्वीप देश था,
     जिस पर इन्होने युगों तक शासन किया था।
----'बुद्ध' को जब 'धम्म का साक्षात्कार' हुआ,
     तो इसी कारवां ने बुद्ध का साथ देकर बौद्ध हो गए।
--- अशोक मौर्य और आर्यों का कलिंग युद्ध हुआ,
     तो इसी कारवां ने अशोक मौर्य को सम्राट बनाया।
----इस कारवां को पतंजलि ने ई. सन. 185 पूर्व उधेडा,
     जो दो हजार वर्षो तक गुलाम-शुद्र बनाये गए।
----इस्लाम ने तलवार-तोफ़ो से भारत को रोंदा,
     तो इसी गुलामों को मुस्लमान बनाया गया,
     इसी कारवां ने इस्लाम कि ताकत बढ़ाई,
     तो मुगल मुसलमानों ने भारत पर शासन किया।
----शिवाजी ने 'हिन्द साम्राज्य' कि घोषणा कि,
     तो इसी कारवां ने शिवाजी कि ताकत बढ़ाई।
----चार हजार किलोमीटर दूर से ब्रिटिश भारत आये,
     तो इसी कारवां के गुलाम ब्रिटिशों के सैनिक बने,
     गुलामों को जब बंदूकों से जीने का सहारा मिला,
     तो इसी कारवां ने ब्रिटिशों को भारत जित कर दिया।
----आंबेडकर ने भारत को गुलामी से मुक्ति कि घोषणा कि,
      तो इसी कारवां ने 1920 से 1956 तक भीम का साथ दिया।
-----भारत के 'लोकतंत्र का संविधान' लिखने का जब ऐलान हुआ,
      तो इसी कारवां ने भारत का 'आरक्षण संविधान' लढ के लिखा।
-----आंबेडकर हिन्दू धर्म के छुआछूत-जातिपाति  से तंग आकर,
       नागपुर में दस लाख अनुयायीयों के साथ बौद्ध हो गए।
-----फिर एक बार विश्व में 'धम्मचक्र' घुमाने के लिए,
       इसी कारवां ने अपनी पूरी ताकत लगाई है।
-----भारत अब विश्व के साथ लोकतंत्र कि राह पर चल पड़ा है,
       तो कुछ भारतीय लोकतंत्र को बदनाम कर रहे है,
       मत भूल जाना इतिहास इस कारवां के 'जंग' का,
       जिन्होंने बदले में कई साम्राज्य जित कर दिए है।
-----यह कारवां वह ताकत है जिसका किसीको अंदाज नहीं,
       आज भी लोकसभा और विधान सभायें हमारी दम से है।
----- भीम के गुजर जाने से ये कारवां बिखर कर बिक रहा है,
       गुजारिश है आओ भीम का सपना भारत बौद्ध बनाओ।

 

Thursday, 28 November 2013

JAI BHIM BUDDHIST BROTHERHOOD

                                                    JAI  BHIM
                      BUDDHIST BROTHERHOOD
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               DR. BABASAHEB AMEDKAR'S URGE TO THE ALL AMBEDKARIETS
                                         MAKE INDIA A BUDDHIST NATION
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                                     ANIL PANCHBHAI-- Cell NO. 9676669465
                                 WHY ? AND HOW ?
(1) We are EDUCATED and DIVIDED but NOT ORGANIZED under ONE UMBRELLA,
      ONE BANNER and ONE BLUE FLAG.
(2) AMBEDKARIETS are divided in all STATES of INDIA.
(3) AMBEDKARIETS are divided in all POLITICAL PARTIES who HATES AMBEDKAR and
      BUDDHA.
(4) AMBEDKARIETS are divided in all SOCIAL MOVEMENTS who HATES AMBEDKAR and
      BUDDHA.
(5) AMBEDKARIETS are divided in all BUDDHIST VIHARS.
(6) MILLIONS of AMBEDKARIETS are HARIJANS HINDUS who are SLAVES.
(7) We do not have a COMMON BUDDHIST VIHAR/PLACE like NAGPUR DIKSHA BHOOMI
      and BOMBAY CHAITYA BHOOMI in other CAPITAL STATES of INDIA.
(8) AMBEDKAR BUDDHISM IS NOT (a) HINAYAN BUDDHISM (b) MAHAYAN BUDDHISM
      (c) MANTRAYAN BUDDHISM (d) TANTRAYAN BUDDHISM OR ANY OTHER SECT.
(9) AMBEDKAR BUDDHISM CONSTITUTION is 22 OATHS- प्रतिज्ञाए :-----
      (१ )    मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को ईश्वर नहीं मानूंगा और उनकी पूजा कभी नहीं करूँगा।
      (२)     मैं राम, कृष्ण को ईश्वर नहीं मानूंगा और उनकी पूजा कभी नहीं करूँगा।
      (३)     मैं गौरी, गणपति इत्यादि हिन्दू धर्मं के किसी भी देवी -देवता को नहीं मानूंगा और न उनकी पूजा
                करूँगा।
      (४)     ईश्वर ने कभी अवतार लिया है, मैं इस पर कभी विश्वास नहीं करूँगा।
      (५)     भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार हैं मै इसे कभी नहीं मानूंगा, मैं ऐसे प्रचार को पागलपन और झूठा
                प्रचार समझता हूँ।
      (६)     मैं श्राद्ध नहीं करूँगा, न कभी पिण्डदान दूंगा।
      (७)     मैं बुद्धधम्म के विरुद्ध किसी भी कार्य को नहीं करूँगा।
      (८)     मैं कोई भी क्रिया-कर्म ब्राह्मण के हाथ से नहीं कराउंगा।
      (९)     मैं सभी मनुष्य एक है इस सिद्धान्त को मानूंगा।
      (१०)   मैं समानता कि स्थापना के लिए प्रयत्न करूँगा।         
      (११)   मैं भगवान बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का पालन करूँगा।
      (१२)   मैं भगवान बुद्ध कि बताई हुई दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करूँगा।
      (१३)   मैं प्राणी मात्र पर दया रखूँगा और उनका लालन-पालन करूँगा।
      (१४)   मैं चोरी नहीं करूँगा।
      (१५)   मैं झूठ नहीं बोलूंगा।
      (१६)   मैं व्यभिचार नहीं करूँगा।
      (१७)   मैं शराब आदि कोई नशा नहीं करूँगा।
      (१८)   मैं अपने जीवन को बौद्धधम्म के तीन  तत्वों अर्थात प्रज्ञा, शील, करुणा पर ढालने का प्रयत्न
                करूँगा।
      (१९)   मैं मनुष्यमात्र के लिए हानिकारक और मनुष्यमात्र को असमानता तथा नीच माननेवाले अपने
                पुराने हिन्दू धर्म का पूरी तरह से त्याग करता हूँ और बुद्धधम्म को स्वीकार करता हूँ।
      (२०)   मेरा पूर्ण विश्वास है कि बुद्धधम्म ही सद्धम्म है।
      (२१)   मैं यह मानता हूँ कि मेरा नया जन्म हो रहा है।
      (२२)   मैं यह पवित्र प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज से मैं बुद्धधम्म कि शिक्षा के अनुसार ही आचरण करूँगा।
                           आइये हम इन प्रतिज्ञाओं को अपने जीवन का आधार बनाये।
 (10)  AMBEDKAR BUDDHISM is the only one UMBRELLA, BANNER and BLUE FLAG
          under which WE all the AMBEDKARIETS CAN MAKE INDIA A BUDDHIST NATION.
(11)   And then WORLD BUDDHIST COUNTRIES SHALL HELP US TO RULE ON INDIA IN
         A BUDDHIST WAY WHICH IS RIGHTEOUS DEMOCRACY.
(12)  Without BROTHERHOOD no one can attain the state of 'BUDDHA'.
(13)  BUDDHIST BROTHERHOOD MEANS NO FEELING OF CASTE, CLASS, CREED,
         COLOR, RELIGION, RACE, GENDER AND MISBEHAVIOUR.
                         JOIN JAI BHIM BUDDHIST BROTHERHOOD

    

Saturday, 16 November 2013

BUDDHA ARE NOT BORN


                                जो लोगो से सिखाता नहीं है- वह बुद्ध कैसे बनेगा ?

'बुद्ध ' ऐसे ही नहीं बनते
हाथ में भिक्षा पात्र लेकर
भारत भ्रमण करना पड़ता है.…
बुद्ध ने हर किसीसे सिखा
चाहे राजा  हो या रंक,
बुद्ध को जीवन में कितने लोग मिले
उनसे जीवन जीने कि कला सीखी। ....
जो कुछ भी बुद्ध ने सिखा है
वह सब लोगो से ही सिखा है। …
स्त्रियो ने बुद्ध को 'शील ' सिखाया
वर्णा जंगल में 'शील ' का क्या महत्व। …
गरीबो ने बुद्ध को 'करुणा ' सिखाई
वर्णा जंगल में 'करुणा ' का क्या महत्व। …
अज्ञानियो ने बुद्ध को 'प्रज्ञा ' सिखाई
वर्णा जंगल में 'प्रज्ञा ' क्या महत्व। ....
बुद्ध ने जो 'पारमिता ' सीखी
वह सब लोगो ने बुद्ध को सिखाई
'नैतिकता ' लोगोने बुद्ध को सिखाई।।।।
जाकर देखो गरीब बस्तीमे
वहाँ 'बुद्ध ' का प्रशिक्षण दिया जाता है.……
राग , लोभ , मोह, नफ़रत पर काबू पाना है
तो ' अछूत ' लोगो से सीखना होगा। ………  

Tuesday, 4 June 2013

WHY AMBEDKAR NOT BECAME DHARMASANSTHAPIKA?

                                                           जनसंख्या और भीम प्रतिज्ञा
                              WHY AMBEDKAR NOT BECAME DHARMASANSTHAPIKA?
(1)  1870 से हर वर्ष वर जनगणना आयुक्त द्वारा जनगणना की जो रिपोर्ट प्रकाशित की जाती रही है , उससे भारत की सामाजिक तथा धार्मिक अवस्थाओं के बारे में अन्यत्र कंही भी उपलब्ध न होने वाली अमूल्य जानकारी उपलब्ध है। 1910 से पहले जनगणना आयुक्त का ' धर्मानुसार जनसँख्या ' नामक एक लेख रहता था। इस लेख में (१) मुस्लिम, (२) हिन्दू और (३) ईसाई आदि की जनसँख्या रहती थी। 1910 की जनसँख्या की रिपोर्ट में चालू परम्परा को छोड़कर नई बात अपनाई गई। प्रथम बार हिन्दुओं का तिन भिन्न वर्गो में बटवारा किया गया - (१) हिन्दू , (२) आध्यात्मवादी और आदिवासी  और (३) अछूत।  तब से यह नवीन वर्गीकरण प्रचलित है। (खं-14, पृ-71)
(2) जनगणना आयुक्त ने दोनों वर्गो को बाटने के लिए खास -खास कसोटिया ( देखे भारत की जनगणना (1911) भाग -1, पृष्ठ -117) निश्चित की है, जो शत प्रतिशत हिन्दू नहीं , ऐसी जातियों और कबीलों के लक्षण इस प्रकार दिए गए है --
            (१) ब्राह्मणों का प्रभुत्व नहीं मानते  (२) किसी ब्राह्मण अथवा अथवा अन्य किसी मने हुए हिन्दू गुरु     से मंत्र नहीं लेते  (३) देवों को प्रमाण नहीं मानते (४) हिन्दू देवी -देवताओं को नहीं पूजते  (५ ) अच्छे ब्राह्मण उनका संस्कार नहीं करते  (६ ) उसका कोई ब्राह्मण पुरिहित नहीं होता (७) हिन्दू मंदिरों के गर्भ गृहों में नहीं जा सकते (८) स्पर्श अथवा एक निश्चित सीमा के भीतर आकर उसे अपवित्र कर देते है (९) अपने मुर्दों को गाढ़ते है  और (१०) गोमांस खाते है और गो के प्रति श्रद्धा नहीं रखते।
             इन दस कसोटियो में से कुछ ऐसी है जो हिन्दुओ को आध्यात्मवादियो और आदिवासियों से पृथक करती है। शेष ऐसी है जो उन्हें अछूतों से पृथक करती है। अछूतों को हिन्दुओ से पृथक करने वाली क्रम
संख्या - २ , ५ , ६ , ७  तथा १० है।
(3) डॉ . बाबासाहेब आंबेडकर ' अछूत - कौन थे और कैसे हो गए ' नामक शोधपूर्ण ग्रन्थ में लिखते है ------
      अछूतों की उत्पत्ति के दो मूल कारण है --(१ ) ब्राह्मणों द्वारा बहिष्कृत लोगो और बौद्धों के प्रति तिरस्कार
       भाव रखना तथा घृणा करना। (२) बहिष्कृत लोगो द्वारा गोमांस भक्षण जरी रखना जबकि दूसरों ने उसे
       त्याग दिया था।
 (4) बौद्ध नागवंशीय थे।
 (5) अछूत बौद्ध थे। नागवंशियो ( बौद्धों ) को अछूत बनाया गया। हिन्दू धर्म में अछूतों के साथ जानवरों से
       बद्त्त्तर व्यवहार है।
 (6) मुसलमान सम्राटो ने अछूतों को इस्लाम मजहब में भाईचारा का दर्जा देकर मुसलमान बनाया। इसलिए  
       मुसलमानों से नफ़रत करते है। भारत के सभी मुसलमान अछूत है।
(7) गुरु गोविन्द सिंग ने अछूतों को सिख बनाया।
(8)  ब्रिटिश साम्राज्य ने अछूतों को ईसाई रिलिजन में भाईचारा का दर्जा देकर ईसाई  बनाया।
(9) लेकिन अछूतों की स्थिति भी इस्लाम मजहब और ईसाई रिलिजन में गरीबी की और लाचारी की थी।
(10) बाबासाहेब आंबेडकर अछूत थे। अछूतों की स्थिति भिन्न भिन्न धर्म में गुलाम, दास,गरीब और लाचारी
      देखकर बाबा ने महाराष्ट्र के येवला कांफ्रेंस 13 अक्तूबर 1935 को हिन्दू धर्मं को त्याग ने की प्रतिज्ञा की।
      यही है वह ' भीम प्रतिज्ञा ' -- हिन्दुओं के पैरोतले की जमीन खिसक गई। हिन्दुओं को लगा यदि आंबेडकर
      इस्लाम मजहब अपने अनुययियो के साथ काबुल करते है तो भारत इस्लाम देश बन जायेगा। यदि
      आंबेडकर ईसाई रिलिजन अपने अनुययियो के साथ अंगीकार करते है तो भारत ईसाई देश बन जायेगा।
(11) विश्व के धर्म के ठेकेदारों ने डॉ . बाबासाहेब आंबेडकर को सत्ता, रूपया और न जाने किस किस बात का
        लालच दिखाया। लेकिन डॉ . आंबेडकर को कोई भी लालच खरीद नहीं सकी --- जैसे सिद्धार्थ गौतम को
        कोई भी सुन्दरिया लुभा नहीं सकी और महाराजा शुद्धोधन, बिम्बिसार और प्रसेनजित अपना राज्य भी 
        देकर लुभा नहीं सके।
(12) जिन्हा ने मुसलमानों के लिए भारत का विभाजन करके पाकिस्तान बनाया। और पाकिस्तान बन गया।
(13)  डॉ . आंबेडकर ने 1935 में स्वंतंत्र वसाहत - SEPARATE SETTLEMENT माँगा था -- तो सम्पूर्ण भारत
         में  गाँधी और उसकी कांग्रेस ने आंबेडकर और अछूतों के खिलाफ ऐसा होहल्ल मचाया, वातावरण बनाया
         की जैसे युद्ध छिड़ गया हो, डॉ . आंबेडकर को जान से मार ने की कोशिश की गई, भारत भर अछूतों के
         मकान जलाये गए, गाँव जलाये गए, खून-खरबा हुआ- ये सब गाँधी और उसके कांग्रेस ने करवाया।
(14) गाँधी और उसकी कांग्रेस ने मुसलमानो को अलग पाकिस्तान हंसी और खुषी से दिया और एक कोरा  चेक
        भी दिया- लेकिन गाँधी और उसकी कांग्रेस ने आंबेडकर और उसके जाती के लोग अछूतों के साथ ऐसा
        दुश्मन जैसा व्यवहार क्यूँ किया ? देखिये पूना पैक्ट।
(15) हिन्दू मुसलमान से डरता है क्यूँ की एक मुसलमान 10 हिन्दुओ के बराबर होता है ऐसा डॉ . आंबेडकर
        अपनी पुस्तक थॉट्स आन पाकिस्तान में लिखते है।
(16) यदि डॉ . आंबेडकर और उसकी जनता अछूत सेना मुसलमान बन कर इस्लाम मजहब कबुल करते, तो
        आज भारत की हालत क्या होती? हिन्दुओ ने कभी सोचा है ?
(17) यदि डॉ . आंबेडकर और उसकी अछूत सेना क्रिस्चियन बनकर ईसाई रिलिजन को अपनाती तो, भारत का
        नक्शा क्या होता? क्या कभी हिन्दुओ ने सोचा है?
(18) गाँधी और उसकी कांग्रेस और हिन्दुओ को याद होगा -- पूना के पास के ' कोरेगांव का युद्ध '. इस युद्ध में
        अछूत- महार सेना ने ' मराठा साम्राज्य ' का विध्वंश- विनाश किया था। डॉ . आंबेडकर जब जीवित थे तो
        हर वर्ष - 1 जानेवारी को कोरेगांव जाकर कोरेगांव के शहीद स्तम्भ के निचे अपना नतमस्तक करके
        प्रणाम करते थे।
 (19)  डॉ . आंबेडकर ने 13 अक्तूबर 1935 से 13-14 अक्तूबर 1956 याने पुरे 20 वर्ष हिन्दुओ को सोचने के लिए
          समय दिया। इस 20 वर्ष के दौरान डॉ , आंबेडकर ने  भारत को एक विश्व - संविधान दिया , जिसमे
          अमेरिका, कनाडा, ब्रिटन, साऊथ अफ्रीका, थाईलैंड और अनेक डेमोक्रेटिक देशो के मानव - अधिकारों के
          मूल अधिकार- विधान है और भारत के शाशित, शोषित, अनाथ, असहाय, दलित, पीड़ित, माइनॉरिटीज
          और वंचित महिलाओ के लिए मूल अधिकार सुरक्षित किये है जिसे 'FUNDAMENTAL RIGHTS'-
         (1) Liberty (2) Equality (3) Justice and (4) Fraternity कहते है।
(20) हिन्दू कोड बिल--  ऐसा बिल  जो भारत की नारी को ' हिन्दू ओ की धर्मशास्त्रों की गुलामी ' से आज़ादी
        दिलाती है --डॉ आंबेडकर ने नेहरू और उनके मंत्रिमंडल के सामने पास करने के लिए रखा तो सभी विरोधी
        हो गए देखकर डॉ आंबेडकर ने अपनी मंत्री पद से त्याग दिया। भारत की नारी के लिए ऐसा महान  त्याग
        आज तक किसी ने किया है? आज के तारीख में ' महिला आरक्षण बिल ' के पक्ष में BJP PARTY या
        कांग्रेस के law Minister ने अपनी मंत्री पद से त्याग नहीं दिया।
(21) विश्व के जितने भी धर्म संस्थापक हुए --जैसे बुद्ध, क्राइस्ट, कृष्ण, मोहम्मद पैगम्बर, नानक आदी इन
        सभी में डॉ आंबेडकर सबसे ज्यादा पढ़े - लिखे थे और उनके पास विश्व के विख्यात युनिवेर्सिटीयोँ की
        डॉक्टरेट की अनेक विषयों में डिग्रियां थी। ऑक्सफ़ोर्ड युनिवर्सिटी के मुताबित  डॉ आंबेडकर का दुनियां
        के 100 INTELLECTUALS में TOP ONE और कार्ल मार्क्स का नम्बर तीसरे स्थान पर आता है .
        कार्ल मार्क्स यह धर्म संस्थापक नहीं है क्योंकि कार्ल मार्क्स धर्म को अफु की गोली मानता है।
(22) यदि डॉ आंबेडकर चाहते तो अपना एक नए धर्म की स्थापना कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं
        किया? क्यों ?
(23) महाबोधि सोसायटी, कलकत्ता की मासिक पत्रिका 'महाबोधि ' मई 1950 में डॉ आंबेडकर का एक लेख
        'The Future of Buddha and His Religion' प्रकाशित हुआ था--उसमे लिखा था "संत महात्माओं के
        निर्माण के दिन अब बित चुके हैं और संसार में कोई नया धर्म पैदा होने वाला नहीं है। संसार को प्रचलित
        धर्मों में से ही किसी एक धर्म को चुनना होगा ".  डॉ आंबेडकर ने धर्मं परिवर्तन के पहले ही यह
        भविष्यवाणी की थी। और भी एक दूसरा कारण  है---
(24) और वह कारण यह है की हिन्दुओं के 'ईश्वर अवतारवाद ' को ही समाप्त कर दिया। 'गीता ' के मुताबित
        अब कृष्ण ईश्वर के रूप में दोबारा पैदा नहीं होगा। इस्लाम के मुताबित मोहम्मद पैगम्बर यह आखरी
        पैगम्बर है---अब इस्लाम में भी दूसरा पैगम्बर पैदा नहीं होगा। बाइबल के मुताबित क्राइस्ट यह आखरी
        क्राइस्ट है-- दूसरा क्राइस्ट पैदा नहीं होगा। सिद्धार्थ गौतम बुद्ध भी यह आखरी बुद्ध है-- कोई दूसरा बुद्ध
        पैदा होने वाला नहीं ऐसा डॉ आंबेडकर भविष्यवाणी कर के गए है। 
 (25) डॉ आंबेडकर को  --बुद्ध, क्राइस्ट, मोहम्मद पैगम्बर, कृष्ण, नानक आदि से कम आखना यह विश्व की 
        सबसे बड़ी भूल होगी और इस भूल को एक जघन्य अपराध माना जाएगा।
       
       

Wednesday, 8 May 2013

THE OLD BUDDHA (563-483) and THE NEW BUDDHA (1891-1956)


            THE OLD BUDDHA AND THE NEW BUDDHA
                                             सिद्धार्थ गौतम महाकारुणिक बुद्ध ( B.C. 563 -  483 )
                                                                           और
                                             डॉ  भीमराव आंबेडकर महामैत्रैय बुद्ध ( 1891 - 1956 )

सिद्धार्थ गौतम बुद्ध, जिन्होंने भारत में BC 438 से लेकर BC 483 याने पुरे 45 वर्षो तक भारत भर पैदल घूमकर  प्रज्ञा और करुणा द्वारे प्रचार और प्रसार किया उसे धम्म कहते है। उन्होंने कहा था मेरे धम्म का आधार प्रज्ञा और करूणा है। यही वो कारण है आगे चलकर धम्म का विभाजन हुआ। जिन्होंने करूणा का पक्ष लिया वे हिनयानी या स्थविर वादी कहने लगे। और जिन्होंने प्रज्ञा का पक्ष लिया वे महायानी कहने लगे। और आज तक करूणा बड़ी की प्रज्ञा बड़ी, यह विवाद कोई भी बौद्ध राष्ट्र समाप्त नहीं कर सका।
महाकारुणिक सिद्धार्थ गौतम के प्रचार और प्रसार- आन्दोलन  के कारण ही, उनके जीवन काल में ही आर्यों के अधर्म - (असमानता का धर्म )  चातुर्वर्ण्य ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र ) का सफाया हो गया। इसका सारा श्रेय गौतम बुद्ध को जाता है। यह विश्व की ऐसी पहली  महा क्रांति थी जो बुद्ध के पहले किसी ने नहीं की थी।
यह ऐसी क्रांति थी की भारत में सारा उल्टा -पलटा हो गया और  शुद्र राजा या देश के सत्ताधारी बन गए। और करिश्मा देखो जो ब्राह्मण थे वे भिखारी बन गए। उदहारण के लिए आप वशिष्ट और विश्वामित्र की लड़ाई का मुख्य कारण देख सकते है। वशिष्ट और बुद्ध का संवाद आप पढ़ सकते है। विश्वामित्र की  इस लड़ाई में आखरी जीत हो गई। ऐसी  ही एक जीत अशोक की हुई। ऐसी एक जीत शाश्त्रों की हुई -वेदों की ग्रंथो की हार हुई और बुद्धा के वचन त्रिपिटक और महायान ग्रन्थ बन गए। ब्राह्मण सत्ताधारी और समाज तिलमिला गया। सारी व्यवस्था बिखर गई। ब्राह्मण विद्वानों के पैरों तले की जमीन खिसक गई। बुद्ध के प्रज्ञा के सामने ब्राह्मण हार गए।
इसी प्रज्ञा में  सम्राट अशोक का जन्म हुआ।
कलिंग देश के राजा और व्यापारी लोगों ने अशोक के जहाजों को रोक के रखा था, जिसके कारण अशोक को कलिंग पर लड़ाई करनी पड़ी और इस युद्ध में जो रक्तपात हुआ वह सारा विश्व जनता है,  और उसके बाद जब ब्राह्मणों ने जो इतिहास लिखा उसमे सम्राट अशोक को चांडाल कहा है। इसी सम्राट अशोक ने ब्राह्मणों की नीव खोद डाली और भारत को बौध्यमय बना दिया। 
कहने का तात्पर्य यह की बुद्ध ने उस समय की सारी सामाजिक व्यवस्था ही बदल दी।
डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ' बुद्ध एंड हिज धम्म ' ग्रन्थ में लिखते है ---- तथागत ने समजाया :- " संसार में आने का उद्देश्य ही यह है कि दरिद्रो, असहायों और आरक्षितो का मित्र बनना। जो रोगी हों ---श्रमण हों व दुसरे कोई भी हों -- उनकी सेवा करना। दरिद्रों, अनाथो और बूढों की सहायता करना तथा दूसरों को ऐसी करने की प्रेरणा देना।" सम्राट अशोक ने भारत में ही नहीं सम्पूर्ण  विश्व में यह अपना मिशन-कार्य बनाया। और बुद्ध के आठ अस्थियोंको 84 हजार टुकडे सुवर्ण के डब्बियों में बंद करके सम्पूर्ण भारत में ही नहीं, विश्व के दुसरे देशों में भी उसपर स्तूप बनाये और उस स्तूप के आगे एक अशोक स्तम्भ गाढ़ दिया जिसे राजाज्ञाएं कहते हैं।
सम्राट अशोक का grandson सम्राट बृहद्रथ मौर्य की ही हत्या BC 185 में उसके ही  सेनापति पुष्यमित्र ने अपने ही गुरु पतांजलि के कहने पर की थी। उसके बाद बौद्ध राजाओं, भिक्षुओं और बौद्ध लोगोंका जो सरे आम कत्ल हुआ वह इतिहास रक्तों के पन्नों से ऐसा लथपत है जिस की मिसाल विश्व में कंही भी नहीं मिलती, और इस युद्ध में ब्राह्मणों की ऐसी जित हुई की बौद्ध धम्म अपने ही वतन भारत से दुसरे देशों में भाग गया और दो हजार वर्षों तक लौटकर नहीं आया , और  जो लोग बौद्ध थे उनको गुलाम बनाया गया, और इन गुलामों को एक नया नाम दिया गया और वो नाम था  'शुद्र ' और जो बौद्ध लोग लड़ते लड़ते जंगल में भाग गए उन्हें न - छूने का कानून बना दिया, बादमें उन बौद्ध लोगों को एक नया नाम दिया गया ' अछूत '
इस तरह बुद्ध और उसके धम्म का नामोनिशान भारत से मिट गया।
विश्व के दुसरे विकसित और समृद्ध देशों में जो आज बुद्ध धम्म दिखाई दे रहा है, वह उसका असली चेहरा नहीं है, वह उसका नकली चेहरा है, वह उसका विकृत रूप है , वह वंहा दुसरे देशों के नाले में बहकर और गन्दा हो गया है। वंहा भिक्षु शादी करते हैं और वह सब काम-कार्य करते हैं, जिसे बुद्ध ने मना किया है, या जिसे बुद्ध अधर्म कहते हैं। वंहा नैतिकता की कोई कीमत नहीं है। वंहा उन्होंने अनैतिकता को नैतिकता कहा है। हाँ एक बात मानना पड़ेगा की वंहा बुद्ध की बहुत बड़ी-बड़ी मुर्तियोंकों सोने और हीरे-जवारत से सजाया गया हैं।
जापान, कम्बोडिया, थाईलैंड, ताइवान और चीन में आज तक दूसरा बुद्ध क्यों पैदा नहीं हुआ, जो उनकी धरती पर  धर्मचक्र परिवर्तित कर सके। इसके कई कारण है। ( Read Dr. B.R. Ambedkar's Writing and Speeches published by Maharashtra Government, India.)
जो धर्मचक्र परिवर्तित करता है- घुमाता हैं उसे ही बुद्ध कहते हैं।
बोधिसत्व धर्मचक्र परिवर्तित नहीं कर सकता। धर्मचक्र परिवर्तित करने की शक्ति बोधिसत्व में नहीं होती। धर्मचक्र परिवर्तित करने की शक्ति सिर्फ बुद्ध में होती हैं। इसलिए विश्व के बोधिसत्व ने बुद्ध की बराबरी करने का अपराध नहीं करना चाहिए। ऐसा अपराध किया गया है, इसलिए मुझे यह लिखने की आवश्यकता महसूस हुई है। बोधिसत्व देंग्योदाइशी साइच्यो ( जन्म : इ. स. 767 -- निर्वाण : 4 जून 822 ) तेंदाई पंथ के संस्थापक की तुलना डॉ आंबेडकर के साथ कैसे की जा सकती है -- यह तो वह कहावत हो गई ' कंहा  राजा भोज और कंहा  गंगू तेली।' क्या देंग्योदाइशी साइच्यो ने अपने लाखों लोगों के साथ धर्मचक्र परिवर्तन किया है - जैसे डॉ आंबेडकर ने अपने दस लाख लोंगे के साथ धर्मचक्र परिवर्तन किया है ? फिर यह किसकी चाल  है जो डॉ आंबेडकर को नीचा दिखने की कोशिश कर रहा है?
गौतम बुद्ध की तुलना विश्व में सिर्फ डॉ आंबेडकर से की जा सकती है और किसीसे नहीं। या यूँ कहिये डॉ आंबेडकर की तुलना सिर्फ गौतम बुद्ध से की जा सकती है और किसीसे नहीं।
बुद्ध की तुलना बुद्ध से ही की जा सकती है। एक बुद्ध ने अपने पांच भिक्षुओं के साथ  इ.स. पूर्व  438  में धम्म चक्र घुमाया जिसने  करुणा और प्रज्ञा से संपूर्ण विश्व को प्रकाशीत, प्रज्वलित और प्रदीप्त किया। तो दुसरे बुद्ध ने
इ. स. 1956 में अपने दस लाख अनुयायीयों के साथ नागपुर में सधम्मचक्र परिवर्तित किया जिसने भारत के संविधान द्वारा विश्व  में भाईचारा - FRATERNITY का  शंखनाद किया और जिसकी आवाज विश्व की आवाज हो गई है। 
This is the history of OLD BUDDHA.
Now the NEW HISTORY of NEW BUDDHA  starts ------------------------------------------
डॉ आंबेडकर का ' Buddha and FUTURE of HIS DHAMMA ' नामक लेख ' महाबोधि सोसायटी, कलकत्ता ' की मासिक पत्रिका में मई 1950  में प्रकाशित हुआ था। जिसमें लिखा है :- " एक प्रश्न है जिसका उत्तर प्रत्येक धर्म को देना चाहिए। शोषितों और पैरों तले कुचलों के लिए वह किस तरह की मानसिक और नैतिक राहत पंहुचता हैं? यदि वह ऐसा नहीं कर सकता हो तो उसका अंत ही होगा। क्या हिन्दू धर्म पिछड़ें वर्गों, अछूत जाती  और जन -जातियों के करोंडों लोगों को कोई मानसिक और नैतिक राहत पंहुचता है?  निश्चित नहीं। क्या हिन्दू इन पिछड़े वर्गों, अछूत जाती और जन -जातियों से यह आशा रख सकते हैं कि बगैर किसी मानसिक और नैतिक राहत की उम्मीद किए वे हिन्दू धर्म को चिपके रहेंगे? इस तरह की आशा रखना सर्वथा व्यर्थ होगा। हिन्दू धर्म ज्वालामुखी पर सवार हुआ है। आज यह ज्वालामुखी बुझा हुआ नजर आता है। लेकिन सत्य यह है की यह बुझा हुआ नहीं है। एक बार पिछड़ें वर्ग, अछूत जाती और जन -जातियां का यह करोंड़ों का शक्तिशाली समूह अपने पतन के बारें में सचेत हो जाएगा और यह समझ जाएगा कि अधिकतर हिन्दू धर्म के सामाजिक दर्शन के कारण ही ऐसा हुआ है, तब यह ज्वालामुखी फिर से फट जायेगा। रोमन साम्राज्य में फैले मुर्तिपुजन को  ईसाई धर्म द्वारा बहार फेक दिए जाने की बात यंहा याद आती है। जैसे ही लोंगोंको यह एहसास हुआ कि मुर्तिपुजन से उन्हें किसी तरह की मानसिक और नैतिक राहत मिलनेवाली नहीं है, तो उन्होंने उसका त्याग किया और ईसाई धर्म को अपनाया। जो रोम में हुआ वही भारत में जरुर होगा, हिन्दू लोगों को समझ आनेपर वे निश्चय ही बौद्ध धम्म की ओर ही मुड़ेंगे। " डॉ आंबेडकर की यह चेतावनी और भविश्यवाणी 1956 में सच हुई।
महामैत्रेय आंबेडकर सम्बुद्ध ने इसी उपरोक्त लेख में कहा :- " और यह ध्यान रहे कि यह नया जगत पुराने जगत से सर्वथा भिन्न है।" इसका यह आशय है की गौतम बुद्ध का जगत पुराना है - क्योंकि बुद्ध के ज़माने में सिर्फ चार ही जातियां थी:- (१) ब्राहमण, (२) क्षत्रिय, (३) वैश्य और (४) शुद्र।  और तिन धर्म थे -
(१) आर्य-वेद  धर्म (२) जैन धर्म और (३) बौद्ध धम्म। और ब्राह्मणी - दर्शन के अतिरिक्त कोई बासठ दार्शनिक मत थे और ये सभी ब्राह्मणी - दर्शन के विरोधी थे।
लेकिन डॉ आंबेडकर के ज़माने में चार हजार जातियां है। आर्य-वेद धर्म, जैन धर्म और गौतम बुद्ध के बाद चार  मुख्य धर्म उत्पन्न हुए :- (१) ब्राहमण- मनुस्मृति धर्म, (२) ख्रिश्चन रिलिजन   (३) इस्लाम मजहब और (४) क्यम्युनिजम। और हजारों अनेक अलग अलग पंथ है।
सम्राट अशोक का एक अखंड संपूर्ण बौद्ध भारत का इ.स. पूर्व 185 के बाद 627 राजा और महाराजाओं के  विभिन्न राज्यों में इ.स. 1950 तक  विभाजन हुआ।
ब्रिटिश सम्राट के समक्ष, लंडन के गोलमेज सम्मेलन में अध्यक्ष ने कहा :- " डॉ आंबेडकर, क्या आप इसे संविधान में लिखेंगे ? "( बाबासाहेब डॉ आंबेडकर सम्पूर्ण वाड्मय - खंड 5, पृष्ठ 147 -भारत सरकार प्रकाशन )
खंड 5, पृ ष्ठ 153 पर डॉ आंबेडकर ने कहा :--" -- तब संघीय संविधान कार्यान्वित करने का हमारा उद्देश्य पूरा हो जाता है। यह राजा - महाराजाओं की स्वंतंत्रता के अनुरूप रहेगा कि वे संघ में शामिल होना चाहते हैं या नहीं। "
मेरे कहने का अर्थ है ' भारत का संविधान ' लिखने का अधिकार डॉ आंबेडकर को  ब्रिटिश सरकार और गोलमेज परिषद् के छब्बीसवी बैठक -- 21 सितम्बर 1931 में ही दे दिया था। 
(१) डॉ आंबेडकर ने संघीय संविधान द्वारा भारत को 26 नवम्बर,1950 में सम्राट अशोक को उसका भारत भेंट  कर दिया।
(२) डॉ आंबेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 में  भारत को बौद्धमय करके सिद्धार्थ गौतम बुद्ध को उसका भारत वापस कर दिया।
डॉ आंबेडकर ने यह (१) और (२) प्रमुख कार्य करके भारत को पुनर्जीवित करके, भारत का इ.स. पुर्व का सुवर्ण काल, गौरान्वित काल लोटा दिया।
क्या ऐसा कार्य करने की महान शक्ति किसी भारतीय में थी, है, या रहेगी ?

  
  
              

Saturday, 4 May 2013

JAI BHIM

                                                                 जय  भीम 
आज भारत में "जय भीम " कहकर नमस्कार लेने वालों की संख्या कम से कम 5 करोड़ है। जो किसी एक 5 करोड़ वाले स्वंतंत्र देश की कुल लोक संख्या के बराबर है।
भारत में 'जय भीम ' - नमस्कार लेने का चलन डॉ . बाबासाहेब आंबेडकर के जीवन में ही उनके सामाजिक आन्दोलन ' महाड  का  पानी का सत्याग्रह ' से शुरू हुआ था।
'POONA PACT ' यदि नहीं होता, तो डॉ . बाबासाहेब आंबेडकर का " SEPARATE SETTLEMENT " ऐसा एक ' स्वंतंत्र वसाहत ' होता, जो अपने आप में एक स्वंतंत्र देश कहलाता,जिसमे स्वन्तन्त्रपुर्वक रहनेवाले लोग सिर्फ ' जय भीम' कहने वाले होते। लेकिन ' जय भीम ' कहनेवालों का ऐसा दुर्भ्याग्य है जिस पर ' गाँधी  और उसकी कांग्रेस ' ने उनके मुंह का ही निवाला सदा के लिए छीन लिया। निवाला छीन लेने के कारण  आज ' जय भीम ' वाले सत्ता से बेदखल है। सत्ता से बेदखल होने के कारण जय भीम वाले गाँधी और कांग्रेस के गुलाम है। यह एक नए प्रकार की गुलामी हम जय भीम वालों पर थोपी गई है। जिसे हम लोगोंको समजना चाहिए। इसका एक नयी दृष्टी कोण से, नए अंदाज से स्वंतंत्र पूर्वक अभ्यास करना चाहिए। जब तक कांग्रेस जिन्दा रहेगी तब तक जय भीम वाले भारत पर राज नहीं कर सकते। ' भारतीय जनता पार्टी ' भी कांग्रेस का एक कट्टर रूप है जिसे जहाल रूप कहते है - वह कांग्रेस पार्टी से भी महा भयानक रूप है, भारत में बुद्ध और उसके धम्म को बिलकुल बर्दास्त नहीं करती। भारतीय जनता पार्टी का महानायक - श्रीराम है - जिसने शुद्र लोगों के राजा ' शम्भुक ' जो बुद्ध ने बताई ' ध्यान साधना 'कर रहा था, उसका निष्कारण वध किया।
तुम्हारा कोई भी मित्र नहीं है। वेदों के ग्रन्थ तुम्हारे खिलाफ लिखे गये है। पुराण जिनकी संख्या डॉ . भंडारकर के मुताबित कम से कम 222 है, वे सभी ग्रन्थ तुम्हारे खिलाफ लिखे गया है। ' रामायण ' और ' महाभारत ' ये दोनों ग्रंथो की रचना तुम्हारे खिलाफ रची गई है। ' मनुस्मृति ' जो इनका संविधान है वो भी तुम्हारे लोगोंको दण्डित करने के लिए लिखा गया है। आप ये सभी ग्रन्थ पढ़कर देख लीजिये। आप को सत्य और झूठ समाज में आ जायेगा। विश्व के सभी देशों के लोगों ने ये सभी ग्रन्थ पढ़ना चाहिए।
आप और आप की आने वाली संताने ऐसे भारत में फिर कैसे जियेंगे? इसका हल तो आप को ही ढूढना होगा।
हम ' GOOD MORNING ' के बदले हम ' GOOD MORNING ' कहते, लेकिन हम लोग ' जय भीम ' नहीं कहते, और तो और सामने ' GOOD MORNING ' कहने वाला भी हम ' जय भीम ' कहने पर ' जय भीम ' नहीं कहता।
ठीक वैसे ही ' वालेकुम सलाम ' कहने पर हम लोग ' सलाम वालेकुम ' कहते है, पर हम लोग उनको ' जय भीम ' कहने पर वो लोग बदले में ' जय भीम ' नहीं कहते।
ठीक वैसे ही ' जय श्रीराम ',  ' जय कृष्ण  ' , ' राधे राधे ', ' हर हर महादेव ',  और न जाने कितने प्रकार के नमस्कार हम लोग कहते है - लेते है, पर बदले में वे लोग हमें कभी भी ' जय भीम ' नहीं कहते।  ऐसा रवाया इन  लोंगों का क्यों है? क्या इससे भाईचारा पैदा होगा?
आज कल और एक नया चलन पैदा हुआ है। ' जय भीम ' के द्वारा पैदा होनेवाला  ' नमो बुद्धाय ' अब हम से        ' जय भीम ' नहीं लेता और बदले में हमें ' नमो बुद्धाय ' कहने के लिए कहता है। यह कैसी विडंबना है, यह कैसी मानसिकता है। इसे ' ब्राह्मणवादी ' मानसिकता कहते है। हम तुमसे 'श्रेष्ठ' है। क्या विश्व का कोई भी भिक्षु डाक्टर आंबेडकर से बड़ा हो सकता है? हमें इसका उत्तर चाहिए। क्या पिला चीवर- कपड़ा धारण करने से डॉक्टर आंबेडकर से बड़ा हो सकता है। डॉक्टर आंबेडकर ने दस लाख लोगों के साथ जो धर्मचक्र परिवर्तित किया, क्या विश्व का कोई भिक्षु ऐसा कर सकता है। यदि ऐसा नहीं कर सकता तो, वो अपने आप को बड़ा कैसे समजता है। इसे ही बुद्ध ने 'अज्ञान' कहा है। बुद्ध को न जानना को ही अज्ञान कहा गया है। जो धर्मचक्र को परिवर्तित करने की ताकत- क्षमता रखते है उसे ही बुद्ध कहते है। और यह करिश्मा सिर्फ डॉक्टर आंबेडकर ने दो हजार साल के बाद इसी धरती पर करके दिखाया, यह क्या सोचने का विषय नहीं है? यह एक विपक्ष की चाल  है- राजनीती है, जो तुम्हे सोचने से  रोकता है।
यदि तुम लोग डॉक्टर आंबेडकर को ही ' मैत्रय बुद्ध ' कहेंगे, तो भारत बौद्धामय होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। अपने बाप को अपना बाप कहने में क्या शर्मन्दगी है। डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर बोधिसत्व नहीं थे। डॉक्टर आंबेडकर मैत्रेय बुद्धा थे। ' बुद्ध एंड हिज धम्म ' में खुद बाबासाहेब ने कहा है की ' कब धम्म सधम्म होता है  '--    ' जब वह ' करुणा ' और ' प्रज्ञा ' से ऊपर उठकर ' मैत्री ' को धारण करता है। FRATERNITY- भाईचारा - बंधुभाव ही भारत का संविधान है। यह संविधान ही BUDDHISM  है।

Thursday, 2 May 2013

ONE CONSTITUTION OF ALL COUNTRIES- FRATERNITY

विश्व के राष्ट्र किस दिशा में जा रहे है और उनके देश के लोगोंको किस दिशा में लेकर जाने का है - क्या इसका
100 साल का मास्टर प्लान Righteous Thought से किसी देश के प्रज्ञावान सांसदो ने बनाया है ? यदि नहीं बनाया तो कब बनाओगे ? यदि बनाया है तो, नया प्रेसिडेंट या नया पंतप्रधान आते ही पुरानी राजनैतिक विचारधारा क्यों बदल दी जाती है ? जिसके कारण लोगोंका मनोबल गिर जाता है और राष्ट्र में अस्थिरता आ जाती है और राजनीती में लोगोंका विश्वास पक्का होने के बजाय, लोग राजनीति को एक मजाक समजकर उसे सिखाने के बजाय उससे अज्ञान रह जाते है।
यदि अपने अपने राष्ट्र को अधिकाधिक मजबूत और लोकशाही के मार्ग में कल्याणकारी, हितकारी और विकासशील बनाना है, तो अपनी अपनी प्रजाकों वे सब मूल अधिकार देने होंगे जिसे कानूनन सुरक्षा देनी होंगी - जिसे स्वतंत्रता, समता, न्याय और भाईचारा कहते है।
यदि यह मूलमंत्र सभी देशोंका होगा तो विश्व में कंही भी युद्ध नहीं होगा और शांति प्रस्थापित करने में सभी का सहयोग प्राप्त होगा।
रही बात धर्म की तो धर्म को दिल में धारण करो। धर्म का बाजार मत लगाओ। धर्मं को मैदान में मत उतारो। धर्मं को रास्तेपे मत उतारो। धर्म लहूलुहान हो जायेगा। फिर कोई भी नहीं बचेगा। न आप बचोगे और न आप का धर्म बचेगा। यदि अपना अपना धर्म बचाना है, तो सबसे उत्तम मार्ग है, अपने अपने धर्म की बाजार में मत बोली लगाओ या उसे मत बेचो, नहीं तो धर्मं का स्वरुप बाजारुपन हो जायेगा। बाजारुपन का अर्थ आप खूब अच्छी तरह से समजते हो, मुझे उसका गहरा अर्थ समजाने की जरुरत नहीं होगी। यदि उस धर्म को यदि वह गहरा बाजारू अर्थ मिल जाता है तो इसके लिए आप वे सभी जिम्मेदार है जो उस धर्म के लोग है। फिर उस बाजारू धर्म का उपयोग वैसा ही किया जाता है जैसे किसी बाजारू औरत का किया जाता है। फिर कैसा रोना धोना, चिल्लाना, शोर मचाना, हंगामा करना और तो और खून खरबा करना। अपने अपने धर्म की इज्जत करना सीखो, अब नहीं सीखोगे तो कब सीखोगे? धर्म ये तुम्हारे दिल के समान है। दिल जैसे तुम्हारे शारीर के अन्दर रहता है, वैसे ही धर्मं को मन के दिल में रखो। धर्म से प्यार करना सीखो। और बात यह है की जिससे तुम्हे प्यार हो जाता है, उसे सरे आम बदनाम नहीं करते। धर्मं यह प्यार करने की चीज है, उसे इतना प्यार करो की तुम धर्म के बनकर रह जाओगे, और फिर धर्म तुम्हारा बनकर रह जायेगा। यही वह राज है धर्म को जानने का. वरना तो बाकि सब धर्मं का ढोल खूब पिट ते रहते है और ज़माने को यह दिखाते रहते हैं की उनके जैसा धर्म को जाननेवाला और दुनिया में दूसरा और कोई नहीं है। ऐसे धर्म के पाखंडी लोगों से आम जनता ने दूर ही रहना चाहिए। और धर्म को बाजारू इन्ही पाखंडी लोगोने बनाया है, इसलिए ऐसे लोगोंसे सावधान रहना चहिये।
दुनिया में आज तक जितने भी युद्ध हुए, वे सभी इन्ही पाखंडी लोगोंके कारण हुए है। और मरनेवाले ये पाखंडी लोग नहीं थे, तो इन पाखंडी लोगो ने उन सभी आदमी, औरत और बचोंको मौत के घाट उतरा  - जिसे आम आदमी कहते है। क्योंकि आम आदमी अज्ञानी होता है, पाखंडी नहीं होता।
आम आदमी पाखंडी नहीं, ज्ञानी होना चाहिए। और ज्ञान का मूल है भाईचारा। भाईचारा में नफ़रत नहीं होती। और जंहा नफ़रत नहीं वंहा युद्ध कैसा?
इसलिए सभी देशों का एक संविधान होना चाहिए, जिसकी बुनियाद सिर्फ और सिर्फ भाईचारा होनी चाहिए।    

Wednesday, 17 April 2013

THIS IS NOT BUDDHISM - THIS IS UNIVERSAL TRUTH

                                               
                                                  THIS IS NOT BUDDHISM
                               THIS  IS UNIVERSAL TRUTH

जिस चीज का साक्षात्कार की अनुभूति किसी भी व्यक्ति को विश्व के किसी भी कोने में कि जाती है, उसे BUDDHISM कैसे कह सकते है ? उसे तो UNIVERSAL TRUTH ही कहते है। उसे BUDDHISM  कहने से बाकी धर्म के लोग जैसे HINDUISM , CHRISTIANITY और ISLAM कैसे अपनाएंगे ? कैसा अभ्यास करेंगे?
वे  उस UNIVERSAL TRUTH तक कैसे अनुभव कर सकेंगे ? वे  उस  UNIVERSAL TRUTH का अनुभव नहीं करेंगे तो वे क्या उस UNIVERSAL TRUTH से अनिभिज्ञ - अज्ञान रहेंगे ? और इस महा अपराध के लिए कौन जिम्मेदार होगा ? इस सभी विचारों पर विश्व के  BUDDHIST लोगोने विचार करना चाहिए, तभी इन सवालों का सही सही जवाब मिलेगा और विश्व में  जो  UNIVERSAL TRUTH है उसे विश्व के लोगों को साक्षात्कार - अनुभव करने की प्रेरणा मिलेगी।
UNIVERSAL TRUTH   का कोई पक्ष नहीं है, उसे BUDDHISM का नाम देकर एक पक्षीय मत बनाओ।
विश्व में BUDDHISM एक community के लोग से पहचाने जाते है, यह एक बड़ी विडंबना है, यह एक बड़ी भूल है, जिसके कारण BUDDHISM के प्रचार और प्रसार में बाधा उत्पन्न हो गई है. यदि इस बात को हर बुद्धिस्ट और Ambedkariet  समज सकता है, तो Buddhism के प्रचार और प्रसार करने में बहुत बड़ी स हायता होगी और बाबासाहेब आंबेडकर का भारत को बौद्धामय बनाने का सपना साकार होगा।
Buddhism के पहेले का धर्म जिसे आर्य धर्म  या वेद धर्मं कहा जाता है, उस वेद धर्म ने भारत के लोगों को चार वर्णों में विभाजित किया था। लेकिन भारत में आर्य आने के पहले भारत वर्णों में या जाति में विभाजित नहीं था। भारत को वर्णों में विभाजित करने की राजनीति आर्यों की है और उसके बाद भारत को जाति में विभाजित करने की राजनीति ब्राह्मणों कि मनुस्मृति द्वारा सम्राट अशोक के बाद इसवी सन 185 की है। Buddhism का विनाश होने के ये दो कारण है -- (वर्ण ) और ( जाति ). यदि भारत में वर्ण और जातिया समाप्त कर दी जाये तो, जो बचेगा वह Buddhism होगा. यही भारत का संविधान है, जिसे लोकशाही कहते है।
लोकशाही और कुछ नहीं Buddhism है। और Buddhism universal Truth है। और जिन विश्व के देशो ने इस universal Truth को अपने अपने संविधान द्वारा अपनाया है उसे वे देश Democracy कहते है। भारत में उसे प्रजातंत्र या लोकतंत्र कहते है।
Buddhism को Universal Truth कह सकते हो, लेकिन Universal Truth को Buddhism कहना गलत होगा।

Wednesday, 13 February 2013

2014 GENERAL ELECTION - A DREAM OF 80% POPULATION

भारत को  आजाद  हुवे 60 वर्ष हुवे और वह  विश्व का सब से बडा लोकतांत्रिक देश कहलाता है, लेकिन अब तक वह  सही मायने में लोकतंत्र  देश साबित नहीं हो सका। इसके लिए वे सभी पिछली सरकारे जिम्मेदार है जिन्होंने भारत को लोकतान्त्रिक देश बनाने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई और  आज भारत देश दिन ब दिन पूंजीवादि यों के हाथो में खिलौना बनकर रह गया है। भारत में 20 प्रतिशत पूंजीवादी शासक लोग 80 प्रतिशत शासित SC, ST and OBC लोगों पर शासन कर रही है। ये उन पिछली सरकारों की सोची समझी साझा राजनीती है जो आम गरीब आदमी के समज के बाहर की बात है, जिनके समझ में आता हैं, वे मूक दर्शक है, हतास है, मजबूर है, उनको  CBI और CID का डर है। उनको अपनी नोकरी जाने का भय है। उनको अपना परिवार खो जाने का भय है। ऐसा मानसिक आतंकवाद पुरे जनमानस के दिल में बैठा है।
भारत देश पूंजीवादी देश बनता जा रहा है। और शायद भारत देश क्यमुनिस्ट देश भी बन सकता हैं।
यदि भारत देश को पूंजीवादी और क्यामुनिस्ट बनाने से रोकना है तो भारत देश पर SC, ST और OBC लोंगोंका शासन आना चाहिए और यही लोग भारत के शासक बनाना चाहिए। इसलिए 2014 के लोकसभा के आम चुनाव में सिर्फ SC, ST और OBC लोंगोंके प्रतिनिधि के रूप में Member of the Parliament- सांसद चुनकर लाना चाहिये। उच्च जाती के लोगोंके के सांसद सिर्फ 20 प्रतिशत होना चाहिये।  तब सही अर्थों में लोकतंत्र में जनता की भागीदारी होगी और यह भारत देश सही मायने में लोकतंत्र की दिशा में अग्रसर होते दिखाई देगा वर्ना भारत देश एक लोकतंत्रिक देश है यह एक सपना बनकर रह जायेगा।

Thursday, 4 October 2012

OBC, SC and ST PEOPLE of INDIA

OBC PEOPLE are SHUDRAS and are 50 % population of this INDIA country and 40 % of it are poor, 10 % are very very poor have no food and they are beggers, no education.
SC PEOPLE are the untouchables by HINDU DHARMA and GITA. THEY are worst than Muslims and Chritians by dignity and action in the eyes of the world. SC are very poor by their birth and religion.SC are less than slaves in the world. SC have no voice in INDIA.
ST PEOPLE are trible people in INDIA and do not have existence in rural and urban areas. They live in the forest and do not have any education, jobs and other facilities like Brahmins in the urban areas.
So WHAT IS THE FUTURE OF INDIA?

THE WHOLE WORLD IS BURNING

Once BUDDHA said that the TREE is burning, so the birds on it cannot live on the tree, in the same way the whole world is burning-- therefore the people of the world where they shall go for their shelter and protection.The nuclear countries should give answer.

Friday, 3 August 2012

THE GREATEST INDIAN
THERE SHOULD BE SOME SCALE TO SELECT A GREATEST INDIAN OTHERWISE THE WORLD PEOPLE SHALL LAUGH AND SHALL THINK THAT THE INDIANS ARE THE THE NUMBER ONE FULISH PEOPLE IN THE WORLD.
AND THE SCALE IS THAT_ (1) HE SHOLD CHANGE THE OLD SOCIAL SYSTEM-ORDER ACCORDIND TO THE NEW DEMAND OF THE PEOPLE. (2) HE SHOULD CHANGE THE OLD EDUCATION SYSTEM ACCORDIND TO THE NEW AGE. (3)  HE SHOULD CHANGE THE OLD ECONOMICAL SYSTEM ACCORDING TO THE NEW DEMAND OF THE MAJORITY OF THE PEOPLE. (4) HE SHOULD CHANGE THE OLD POLITICAL SYSTEM ACCORDIND TO THE NEW WORLD DEMAND. (5)  AND THE LAST CHANGE-  HE SHOULD TRANSFER ALL THE RELIGION INTO FRATERNITY.  THESE FIVE ARE THE SCALE TO SELECT THE GREATEST INDIAN.   HE SHOULD CHANGE THE NATION INDIA
TO COMPETE WITH THE OTHER NUCLUER COUNTRIES. 

Monday, 23 January 2012

NEW BUDDHISM means NAVAYAN--1956

नवायान 
' नवायान ' इस  शब्द का विश्व में १३ अक्टोबर १९५६ को नागपुर की धरती पर पहली बार उच्चारण किया गया. और उन्होंने आगे कहा -- ' नवायान यह हीनयान नहीं और महायान नहीं .' और उसके दो महीने के  बाद उस महामानव भारतरत्न बाबासाहेब आंबेडकर (father of Indian Constitution) का  महापरिनिर्वाण 
६ दिसम्बर १९५६ को दिल्ली में हो गया. 
नवायान क्या है, उसकी व्याख्या क्या है , उसका तत्वज्ञान क्या है किसीको पता नहीं.
विश्व  के किसी भी शब्दकोश में ' नवायान ' शब्द नहीं है. 
लेकिन,  लेखक अनिल कुमार पंचभाई ने अपनी पुस्तक ' नवायान ' क्या है?  इसे समजाने का एक सफल प्रयास किया है. यह पुस्तक विजयादशमी के दिन २ अक्तूबर २००६ को सुगत बुक डेपो, नागपुर- ४४००१७ से प्रकाशित की गई. 
' नवायान ' देखने के पूर्व हमें हीनयान और महायान क्या है समजने के लिए संक्षिप्त में  देखना होगा.
हीनयान - ( स्थविरवाद )
' हीनयान ' को समजने के लिए उसके ' तिन पीटक ' याने ' त्रिपिटक '-- बुद्ध के वचन संग्रह पढ़ना चाहिए.
गौतम बुध्द के वचन ' पाली ' भाषा में है. 
गौतम बुद्ध के वचन --(१) विनय  पिटक, (२) सुत्त  पिटक  और (३) अभिधम्म  पिटक.  इसे तिन भागो में विभाजित किया है. इसलिए इसे त्रिपिटक कहते है. 
विनय  पिटक के पांच भाग है :--
                  (१) महावग्ग, (२) चुलवग्ग, (३) पाराजिक, (४) पाचितिय  और (५) परिवार.
सुत्तपिटक के पांच भाग है जिसे निकाय कहते है :-
                  (१) दीघनिकाय, (२) मज्जिम निकाय, (३) संयुक्त निकाय, (४)  अंगुत्तर निकाय, और 
                  (५) खुद्दक निकाय. 
                   दीघनिकाय में ३४ सुत्त है.
                   मज्जिम निकाय में १५२ सुत्त है.

                   संयुक्त निकाय में ७७६२ सुत्त है. और
                   अंगुत्तर निकाय में ९५५७ सुत्त है.

खुद्दक निकाय के पंधरा ग्रन्थ हैं:- (१) खुद्दक पाठ, (२) धम्मपद, (३) उदान, (४) इत्तिवुत्तक, 
                   (५) सुत्तनिपात, (६) विमान-वत्थु, (७) पेतवत्थु, (८) थेरगाथा, (९) थेरीगाथा, (१०) जातक, 
                   (११) निद्देस, (१२) पटिसंम्भिदामग्ग, (१३) अपदान, (१४) बुद्धवंस और (१५) चरियापिटक.
अभिधम्मपिटक के सात भाग है:-- 
                    (१) धम्मसंगिणी, (२) विभंग, (३) धातुकथा, (४) पुग्ग्ल पन्यति, (५) कथावत्थु, (६) यमक और 
                     (७) पटठान.
महायान 
महायान के ग्रन्थ संस्कृत भाषा में है. 
महायान के नौ ग्रन्थ है :- (१) लंकावतार-सूत्र, (२) अष्टसाहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता, (३) सध्दर्मपुण्डरिक,
                      (४) ललित-विस्तार, (५) सुवर्णप्रभास, (६) गण्डव्यूह, (७) तथागतगुह्यक, (८) समाधिराज और 
                       (९) दशभूमिश्वर.
हीनयान, महायान, वज्रयान, मंत्रयान, तंत्रयान, सहजयान ये सभी बुध्द के अंग-नामरूप जैसे है. इसमें से  किसी एक को बुध्द या बुध्द का उपदेश-तत्वज्ञान समजना गलत होगा.
बुध्द हमेशा अन्धो  का एक  उदाहरण दिया करते थे --- एक गांव में कुछ अंधे हाथी को देखने आये, एक ने पीठ को स्पर्श करते हुए कहा ' ये हाथी है', दुसरे ने पैर को छू कर कहा 'ये हाथी है', तीसरे ने सूंड को छू कर कहा 'ये हाथी है', चोथे ने कान को छू कर  कहा 'ये हाथी है', पाँचवे ने दुम छू कर कहा 'ये हाथी है '. इस तरह वे अंधे आपस में बात कर रहे थे. उसी समय वंहा पर  एक आँखवाला आया और उस आँखवाले ने उन अंधों को कहा ये   हाथी के अंग पीठ, पैर, कान, सूंड, दुम  है, ये हाथी का एक-एक अवयव है, ये सब मिलाकर एक सम्पूर्ण हाथी होता है.
इसी अन्धो की तरह विश्व के अज्ञानी लोग  बुध्द के अलग-अलग उपदेश-तत्वज्ञान-मार्ग  को ही बुध्द (हाथी) समज बैठे है.इसी कारण विश्व के हीनयान  बौध्द और महायान बौध्द और उनके राष्ट्रों में भाईचारा FRATERNITY नहीं है, जो भविष्य में BUDDHISM के लिए एक महान खतरा है. विश्व के बौध्द राष्ट्रों का एक COMMON PLATFORM नहीं है. चीन में BUDDHISM  कैद है. रशिया में BUDDHISM की हालत खस्ता है. भारत में BUDDHISM का  पौधा अभी जड़े मजबूत करने में बहुत मेहनत कर रहा है क्योंकि भारत में पुराने BUDDHISM के अनेक दुश्मन है.
पुराना खिचड़ी पकाया  BUDDHISM भारत को बौध्दमय नहीं बना सकता.
इसलिए डॉ. आंबेडकर को १३ आक्टोबर १९५६ को नागपुर में CONVERSION करने के एक दिन पहले कहना पड़ा ' ये मेरा ' नवायान ' है .       
बौध्द धम्म की आधारशिला क्या है?
इस प्रश्न पर की बौध्द धम्म की आधारशिला क्या है, कुछ मतभेद रहा है.
क्या अकेली करुणा बौध्द धम्म की आधारशिला है?
क्या अकेली प्रज्ञा बौध्द धम्म की आधारशिला है?
इस मतभेद के कारण बुध्द के अनुयायी दो पक्षों में विभक्त हो गए थे.
एक पक्ष का मत था की अकेली करुणा ही बौध्द धम्म की आधारशिला है. दुसरे पक्ष का कहना था की अकेली प्रज्ञा ही बौध्द धम्म की आधारशिला है.
ये दोनों पक्ष आज भी विभक्त हैं. 
यदि ' बुध्द-वचनों ' को लेकर विचार किया जाये तो दोनों पक्ष गलत प्रतीत होते है.
इसमें कोई मतभेद नहीं है कि बुध्द धम्म के दो स्तंभों में से एक ' प्रज्ञा ' है. 
प्रश्न यही है कि ' करुणा ' भी दूसरा स्तम्भ है वा नहीं. 
करुणा
करुणा भी बुध्द के धम्म का एक स्तम्भ है-- यह विवाद से परे कि बात है. इसके समर्थन में बुध्द-वचन उद्धृत किया जा सकता है.-- ( देखो पुतिगत्त-तिस्स क़ी कथा ( धम्मपदट्ट कथा )
पुराने समय में गंधार देश में एक बहुत ही भयानक बीमारी से पीड़ित कोई साधू था. वह जंहा कंही बैठता, उसी जगह को गन्दा कर देता. वह एक ऐसे विहार में था, जंहा कोई उसकी सहायता न करता था. वह स्थान इतना दुर्गन्धपूर्ण था कि सभी भिक्षुओं को उस साधू से भी घृणा हो गई. लेकिन बुध्द ने शुक्रदेव नामक भिक्षु से पानी आदि डलवाकर उस रोगी को अपने हाथ से स्नान कराया और उसकी सेवा क़ी.-----जितने भी वंहा एकत्रित हुए थे, उन सभी को आश्चर्य हुआ, इसलिए उन्होंने पुछा कि इतने ऊँचे होकर आपने इतना सामान्य काम क्यों किया?.  बुध्द (तथागत) ने समजाया----
" संसार में आने का तथागत का उद्देश ही यह है कि दरिद्रों, असहायों, और आरक्षितो का मित्र बनना. जो रोगी हों ----श्रमण हों वा दुसरे कोई भी हों-- उनकी सेवा करना. दरिद्रों, अनाथो, और बूढों की सहायता करना तथा दूसरों को ऐसी करने की प्रेरणा देना ".  
प्रज्ञा 
ब्राह्मण विद्या को ही बहुत बड़ी बात समजते थे. आदमी चाहे शीलवान हो और चाहे न हो किन्तु यदि वह विद्वान है, तो उनकी दृष्टी में वह पूज्य था.उन्होंने कहा है की राजा तो अपने देश में ही पूजा जाता है किन्तु विद्वान सर्वत्र पूजित होता है, इसका मतलब था की विद्वान राजा से बढ़कर है.
तथागत ( बुध्द) ने प्रज्ञा को विद्या से भिन्न माना है. 
(देखिये-अंगुत्तर निकाय - वस्सकार सुत्त- चतुक्क निपात )  
--------जिस आदमी में ये चार गुण है, उसे ही मै प्रज्ञावान समजता हूँ. एक आदमी बहुत जनों के हित के लिए
            होता है, बहुत जनों के कल्याण के लिए होता है. उसके कारण बहुत से आदमी सुन्दर, हितकर
            अष्टांगमार्ग के अनुगामी है.
            (१) वह जिस विषय में मन को लगता है, उस विषय में वह मन को लगा सकता है; जिस विषय में मन
                 को नहीं लगाना चाहता उस विषय में वह मन को उधर जाने से रोक सकता है.
            (२) जिस संकल्प  को वह मन में उत्पन्न होने देना चाहता है, उस संकल्प को मन में उत्पन्न होने
                  देता है, जिस संकल्प को मन में उत्पन्न होने नहीं देना चाहता उस संकल्प को मन में उत्पन्न होने
                  नहीं देता. इस प्रकार उसे अपने विचारों पर अधिकार होता है.
            (३) वह जब चाहे बिना कठिनाई के, बिना तकलीफ के चारो लोकोत्तर ध्यानों को प्राप्त कर सकता है,
                 जो इसी जीवन में सुख-विहार के लिए है.
            (४) वह इसी जन्म में आस्त्रवों का क्षय कर,  आस्त्रव -क्षय ज्ञान को प्राप्त हो, चित्त की विमुक्ति को
                 प्राप्त करता है, प्रज्ञा द्वारा विमुक्ति को प्राप्त कर वह इसमें विहार करता है.    
प्रज्ञा आदमी के हाथ की दुधारी तलवार है. 
शीलवान आदमी के हाथ में होने पर यह खतरे में पड़े हुए किसी आदमी की रक्षा कर सकती है.
लेकिन शील-रहित आदमी के हाथ में होने पर यह किसी की हत्या भी करा सकती है.
इसलिए प्रज्ञा से भी शील का अधिक महत्व है.
प्रज्ञा विचार-धर्म है, सम्यक विचार करना . शील आचार-धर्म है, सम्यक आचरण करना.  
नवायान
नवायान यह ईश्वर, परमेश्वर और अल्लाह-खुदा के तत्वज्ञान में विश्वास नहीं रखता.  
नवायान यह धर्म, रीलिजन और मजहब नहीं है. 
धर्म, रीलिजन और मजहब अपने-अपने ईश्वर, परमेश्वर और अल्लाह-खुदा में विश्वास रखते हैं.

नवायान याने :--
* MUST BREAK DOWN ALL THE BARRIERS BETWEEN MAN AND MAN.
* MUST TEACH THAT WORTH AND NOT BIRTH IS THE MEASURE OF MAN.
* MUST PROMOTE EQUALITY BETWEEN MAN AND MAN.
* THAT THOUGH OTHERS MAY NOT LEAD THE HIGHER LIFE, YOU WILL.
* THAT THOUGH OTHERS MAY LIE, TRADUCE, DENOUNCE. OR PRATTLE, 
   YOU WILL NOT.
* THAT OTHERS MAY BE COVETOUS, YOU WILL NOT.
DO GOOD, BE NOT PARTY TO EVIL AND COMMIT NO SIN.
* TO CLEANSE THE MIND OF IMPURITIES.
* TO MAKE THE WORLD A KINGDOM OF RIGHTEOUSNESS.                     
भारत में नवायान की स्थापना करने के पूर्व भारत में मुख्यतः आर्य धर्म, हिन्दू धर्म, जैन धर्म, ईसाई रीलिजन, इस्लाम मजहब और सिख-पंथ प्रचलित थे. जो ईश्वर, परमेश्वर और अल्लाह-खुदा को ही अपने जीवन का जन्म से लेकर मृत्यु तक की सब घटनाओं के लिए जिम्मेदार समजते थे. उनकी नजर में इंसानों  (औरत और आदमी) की कोई किमंत नहीं थी. इसी तत्वज्ञान के अंतर्गत दो हजार वर्षों से आदमी गुलाम बन कर रह गया. 
इसी तत्वज्ञान के कारण विश्व और भारत के लोगों ने  (१) स्वतंत्रता, (२)  समता, (३) न्याय  और (४) भाईचारा के मुलभुत अधिकारों को दफना दिया था.
भारत में बौध्द धम्म का नामोनिशान मिट गया था. और विश्व  में कंही जो बौध्द धम्म है उसमें उनके प्रचलित धर्म की खिचड़ी पकाई गई है. 
विश्व के बौध्द धर्म में ईश्वर, देवी-देवताओं और कर्म-काण्डों-पूजा-अर्चना की खिचड़ी पकाई गई है.  इस तरह विश्व में बौध्द धर्म मिलावटी है. 
बुद्ध ने ईश्वर-तत्वज्ञान के धर्म को अधर्म और अज्ञान कहा.
(देखिये--चुलवग्ग-६ :२. --विनय पीटक )
विश्व के संपूर्ण मानव समाज को अपनी समस्याओं को GOD -ईश्वर के सामने नतमस्तक होकर, जब बाबासाहेब आंबेडकर ने देखा तो उन्होंने इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए जो औषधि-तत्वज्ञान दी है,  उसी का नाम नवायान है. 
" धर्म के भविष्य " के  बारे में बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा:-- 
( देखिये--डॉ. आंबेडकर का लेख- बुध्द और उनके धम्म का भविष्य --१९५० )
१. " समाज को अपनी एकता को बनाये रखने के लिए या तो कानून का बंधन स्वीकारना ओअदेगा या फिर नैतिकता का. दोने के अभाव में समाज निश्चय ही टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा. सभी प्रकार के समाज में कानून की भूमिका अत्यल्प होती है. उसका उद्देश्य होता है ( कानून तोड्नेवालो ) अल्पसंख्यकों को सामाजिक अनुशासन  की सीमा में रखना. बहुसंख्यकों कों मात्र अपना सामाजिक जीवन बिताने के लिए नैतिकता के  प्रामान्य और अधिकार पर छोड़ दिया जाता है, नहीं छोड़ना ही पड़ता है. इसलिए धर्म को नैतिकता के अर्थ में प्रत्येक समाज के अनुशासन का तत्व बने रहना चाहिए.
२. " धर्म की उपर्युक्त परिभाषा विज्ञान के अनुकूल होनी चाहिए. यदि धर्म विज्ञान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है तो वह अपने महत्व को खो कर हंसी और मजाक का विषय बन सकता है और जिवानुशासन के तत्व-रूप में न केवल वह अपनी शक्ति खो बैठता है, बल्कि समय के साथ विछिन्न होकर समाज से लुप्त भी हो सकता है. दुसरे शब्दों में, धर्म को अगर वास्तव में कार्यशील होना है, तो उसे तर्क और विवेक पर आधारित होना चाहिए. इसका ही दूसरा नाम विज्ञान है.
३. " सामाजिक नैतिकता की संहिता के रूप में ठहरने के लिए धर्म को चाहिए कि वह समता, स्वतंत्रता और बंधुता के बुनयादी तत्वों को मान्य करें. समाज जीवन के इन तिन तत्वों का स्वीकार किये बगैर कोई भी धर्म जिन्दा नहीं रह सकता. 
४. " धर्म ने निर्धनता को पवित्रता नहीं बक्शनि चाहिए अथवा उसका उदात्तीकरण नहीं करना चाहिए. धनवानों के लिए निर्धन बनना चाहे संतोषदायी हो भी. परन्तु निर्धनता कभी  संतोषदायी  नहीं होती. निर्धनता को संतोषकारी घोषित करना धर्म का विपर्यास है, बुराई और अपराध को बढ़ावा देना है तथा इस संसार को प्रत्यक्ष में नर्क में ढालना है.
कौन सा धर्म इन आवश्यकताओं को पूरा करता है? इस प्रश्न का विचार करते वक्त इस बात को यद् रखना चाहिए कि संत- महात्माओं के निर्माण के दिन अब बीत चुके हैं और संसार में कोई नया धर्म पैदा होनेवाला नहीं है. संसार को प्रचलित धर्मों में से ही किसी एक धर्म को चुनना होगा. इसलिए इस प्रश्न का विचार प्रचलित  धर्मों तक ही सीमित रखना चाहिए. 
हो सकता है कि प्रचलित धामों में से कोई एक धर्म उपरोक्त मापदन्डों में किसी एक कसौटी पर खरा उतरता हो या कोई दो पर. परन्तु प्रश्न यह है कि क्या कोई धर्म है जो इन तमाम मापदन्डों कि कसौटी पर खरा उतरता है? जंहा तक मेरी जानकारी है इन तमाम मापदन्डों पर खरा उतरनेवाला केवल एक ही धर्म है जिसे नया जगत अपना सकता है. यदि नए जगत को --और यह ध्यान रहे कि यह नया जगत पुराने जगत से सर्वथा भिन्न है-- किसी धर्म को अपनाना ही हो -- और नए जगत को ओउराने जगत कि अपेक्षा धर्म की अत्यधिक जरुरत है-- तो वह केवल बुध्द का धम्म ही हो सकता है.
ये तमाम बातें शायद आश्चर्यजनक प्रतीत होती हो. यह इसलिए कि बुध्द के सम्बध्द में लिखनेवालों में से अधिकांश लोगों ने केवल इसी कल्पना का प्रचार किया है कि बुध्द ने सिर्फ एक ही शिक्षा दी है; और वह है अहिंसा की. यह बहुत बड़ी गलती हैं. यह सच है कि बुध्द ने अहिंसा की शिक्षा दी है. मैं उसके महत्व को कम नहीं करना चाहता हूँ. क्योंकि वह एक महँ सिध्दान्त है. उस पर अमल किए बैगर संसार को बचाया नहीं जा सकता. मैं जिस बात पर बल देना चाहता हूँ वह यह है कि अहिंसा के अतिरिक्त बुध्द ने और बहुत सी बातों की शिक्षा दी है. उन्होंने सामाजिक, बौध्दिक, आर्थिक और राजनैतिक स्वतंत्रता की शिक्षा दी है उन्होंने समानता की शिक्षा दी, न केवल पुरुष और पुरुष के बीच की समानता की, बल्कि पुरुष और स्त्री के बीच की समानता की भी. बुध्द की तुलना में अन्य कोई ऐसे धर्म संस्थापक को खोजना कठिन होगा कि जिसकी शिक्षा लोगों के सामाजिक जीवन के इतने सारे पहलुओं को स्पर्श कराती हो और जिसके सिध्दान्त इतने आधुनिक हों और जिसका मुख्य उद्देश्य इन्सान को इसी धरती पर इसी जीवन में विमुक्ति दिलाना हो, न कि मृत्यु के बाद स्वर्ग का वादा करना."
धर्म  परिवर्तन
डॉ आंबेडकर ने १४ ऑक्टोबर १९५६ को नागपुर में सात लाख अनुयायियों के उपस्थिति में कहा :-
मनुष्य को इज्जत प्यारी है। लाभ प्यारा नहीं होता । हम सम्मान के लिए सघर्ष कर रहे है।
यह है नवायान का आन्दोलन-संघर्ष।
मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है-- इज्जत से रहना। इसकी पूर्ण प्राप्ति तक जितना अधिक हम आगे जा सकते है, उतना है आगे जाने की हमारी तीव्र  इच्छा है। इसके लिए हम जो कुछ भी त्याग करे वह थोडा हैं।
मैंने हिन्दू धर्म का त्याग करने का आन्दोलन १९३५ में शुरू किया था और बराबर इस आन्दोलन को चला रहा हूँ। येवला (नासिक जिल्हा) में इस आन्दोलन को चलने के लिए अप्रैल १९३५ में बड़ा जलसा किया था और उसमें एक प्रस्ताव द्वारा हमने निर्णय किया था की हम हिन्दू धर्म को छोड़ेंगे। मैंने उसी समय यह प्रतिज्ञा की थी कि यद्दपि मैंने  हिन्दू धर्म में जन्म अवश्य लिया है तो भी हन्दू धर्म में नहीं मरूँगा। ऐसी प्रतिज्ञा मैंने आज से २१ वर्ष पूर्व की थी और उसे आज पूरा कर दिखाया। इस धर्मान्तर से मैं बड़ा ही खुश हुआ हूँ और प्रफुल्लित हो उठा हूँ। मुझे ऐसा मालूम होता है कि मैं नरक से छुटकारा पा गया हूँ। मुझे कोई अंधभक्त नहीं चाहिए। जो लोग बौध्द धर्म में आना चाहते है उन्हें खूब सोच समजकर आना चाहिए ताकि वे आगे इस धर्म में सुदृढ़ रह सकें।
नवायान का अर्थ हैं--- हिन्दू धर्म जो जातिवाद का आधार है वह नर्क के समान है, उस नर्क समान हिन्दू धर्म से छुटकारा।
इसलिए डॉ आंबेडकर ने उसी दिन १४ ओक्टोबर १९५६ को अपने सात लाख अनुयायिओं को बौध्द धर्म कि दीक्षा देते समय उनसे २२ प्रतिज्ञा ली थी। 
महायान यह देवी-देवताओं से भरा पड़ा हैं, महायान में पूजा-अर्चना और कर्म-कांड बहुत ज्यादा हैं। 
हीनयान में भी देवी-देवताये, पूजा-अर्चना और कर्म-कांड है।
पुराने बौध्द धर्म में हिन्दू धर्म कि खिचड़ी पकाई गई है। क्योंकि हीनयान और महायान धर्मो ग्रंथो कि रचना इसवी सन के बाद करनेवाले ब्राह्मणवाद के ही लोग थे।
इसलिए डॉ आंबेडकर को पुराने बौध्द धर्म के जगह NEW BUDDHISM means NAVAYAN देना पड़ा।
इसलिए डॉ आंबेडकर को अपने सात लाख अनुयायिओं को निम्नलिखित २२ प्रतिज्ञाए देनी पड़ी।  
बौध्दों कि २२ प्रतिज्ञाएँ 
नवायान कि ये २२ प्रतिज्ञाएँ है:--
१.   मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को कभी ईश्वर नहीं मानूंगा और न मैं उनकी पूजा करूँगा। 
२.   मैं राम और कृष्ण को ईश्वर नहीं मानूंगा और उनकी पूजा कभी नहीं करूँगा।
३.   मैं गौरी, गणपति, इत्यादि हिन्दू धर्म के किसी भी देवी देवताओं को नहीं मानूंगा और न ही उनकी पूजा 
      करूँगा।
४.   मैं ईश्वर ने कभी अवतार लिया है इस पर विश्वास नहीं करूँगा।
५.   मैं बुध्द विष्णु का अवतार है इसे कभी नहीं मानूंगा। मैं ऐसे प्रचार को पागलपन और झूठा प्रचार समजता  
      हूँ।
६.   मैं श्राद्ध कभी नहीं करूँगा और न ही कभी पिंडदान दूंगा।
७.   मैं भौध्द धर्म के विरुध्द किसी भी बात को नहीं करूँगा।
८.   मैं कोई भी क्रिया कर्म ब्राह्मणों के हाथों से नही कराऊंगा।
९.   मैं "सभी मनुष्य एक हैं " इस सिध्दांत को मानूंगा।
१०. मैं समानता की स्थापना के लिए प्रयत्न करूँगा।
११. मैं बुध्द के अष्टांगिक मार्ग का पूर्ण पालन करूंगा।      
१२. मैं बुध्द के बताएं हुए दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करूँगा। 
१३. मैं प्राणिमात्र पर दया रखूँगा और उनका लालन-पालन करूंगा।
१४. मैं चोरी नहीं करूँगा। 
१५. मैं झूठ नहीं बोलूँगा।
१६. मैं ब्याभिचार नहीं करूँगा।
१७. मैं शराब नहीं पीऊंगा।
१८. मैं अपने जीवन को बौध्द धर्म के तिन तत्व अर्थात - ज्ञान, शील और करुणा पर ढालने का प्रयत्न करूंगा।
१९. मैं मनुष्य मात्र के उत्कर्ष के लिए हानिकारक और मनुष्य मात्र को असमान और नीच मानने वाले अपने 
      पुराने हिन्दू धर्म का पूरी तरह त्याग करता हूँ और बुध्द धर्म को स्वीकार करता हूँ।
२०. मेरा ऐसा पूर्ण विश्वास हैं की बौध्द धर्म ही सध्दर्म हैं।
२१. मैं यह मानता हूँ कि मेरा पुनर्जन्म हो जहा हैं।
२२. मैं यह पवित्र प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज मैं बौध्द धर्म की शिक्षा के अनुसार आचरण करूँगा।
यह नवायान की वे २२ पवित्र प्रतिज्ञाएँ हैं जो पुराने बौध्द धर्म में नहीं थी, 
इसी कारण यह NEW-BUDDHISM means NAVAYAN  हैं।

             

                    
     
     
         
हीनयान का ग्रन्थ 

    

Wednesday, 18 January 2012

MANIFESTO OF BHARAT-COMMON PLATFORM

अप्रतिष्ठित  चित्तं 
एक अच्छा हिन्दू, एक अच्छा बौद्ध, एक अच्छा जैन, एक अच्छा क्रिस्टियन, एक अच्छा मुस्लमान, एक अच्छा सिख,  एक अच्छा उद्योगपति और एक अच्छा इन्सान कौन है?
विश्व  की 6  अरब जनसंख्या में से लगभग 5  अरब लोग--हिन्दू धर्मं में  ईश्वर, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, राम, कृष्ण, दुर्गा, काली, देवी-देवताओं , हनुमान,  तिरुपति बालाजी, साईं, विट्ठल, नानक, कबीर, साधू- संत-महंत, ओम -सोहम , -- जैन धर्म में  भगवान महावीर,--- बौध्द धम्म में बुध्द, अमिताब बुध्द,---ईसाई रिलिजन में मेरी मदर, जिसस क्राइस्ट, क्रास, ---इस्लाम मजहब में ईदगाह-मस्जिद  पर नमाज, दरगाह पर मिन्नत, हज  --------जप, तप, आराधना, प्रार्थना, पूजा-अर्चना कर्म-कांड, धूप-अगरबती,  फूल, स्नान, इत्यादियों  में लिप्त रहते है.    

यह एक विश्वास है, जो हजारो वर्षो से चला आ रहा है. 
लेकिन यह विश्वास एक विश्वास ही बनकर रह गया. इस विश्वास की ताबीर-तस्वीर -हकीकत में नहीं बदली. 
इसी विश्वास के लोगों  ने --  ईश्वर, खुदा और जीसस  को नहीं देखा, ना सुना, ना उनसे कोई बात की. आज भी  इसी उम्मीद के सहारे वे जीते हैं कि एक दिन उनका विश्वास रंग लायेगा और वे हंसी-ख़ुशी के साथ मृत्यु को गले लगायेंगे. राह ताकते रह गए और इसी उम्मीद के सहारे कई सदियां  गुजर गई, लेकिन बड़े दुःख के साथ, निराश, के साथ वे इस दुनिया से विदा हो गए, विदा हो रहे हैं, विदा होते रहेंगे. लेकिन  भरोसा आज भी कायम है. और इस उम्मीद की कोई दिशा नहीं--जैसे मृगजल.

कितना बड़ा धोका हुआ है, हो रहा है , और होते रहेगा 5  अरब लोगों  के साथ. और वे कौन लोग हैं  जो इसके लिए जिम्मेदार है?  क्या कोई उपाय नहीं है?  कहते है मानव सबसे ज्यादा INTELLECTUAL है . क्या उसकी यही विद्वत्ता है कि वह अपने ही जाल में फंसा है, जिससे उसकी कोई मुक्ति नहीं है?  

विश्व के कितने घंटे जप-तप- प्रार्थना, पूजा- अर्चना  में बर्बाद हो रहे है. और उसके बाद में मानव में कोई परिवर्तन नहीं. मानव जैसा था वैसा ही है, मानव का दूसरे मानव के साथ कोई मैत्रीपूर्ण व्यवहार नहीं, कोई सदाचार नहीं. वह कल जैसा था वैसा ही आज भी है. वही कल की नफ़रत, वही कल की दुश्मनी, वही खून-खराबा , वही मारपीट-फिसाद, वही क्रोध, वही लालच, वही दगाबाजी. 

ईश्वर और खुदा की याद में  मानव इन्सान नहीं बन पाया. मानव बाहरी शक्तियों का सिर्फ मन से गुलाम बनकर रह गया है. मानव शरीर से स्वतंत्र हुआ है पर मन से आज भी गुलाम है. यही मानव-जाति  की हजारो वर्ष पुरानी  बेदर्द, दुखभरी कहानी-दास्तान है. इसके लिए कौन जिम्मेदार है?  क्या आदमी एक अच्छा  इन्सान बन पायेगा?  वह कौनसा मार्ग है जो आदमी को एक अच्छा इन्सान बनाता है? इस धरती पर अच्छे इंसानों की कमी क्यों है? क्या धर्मो में कमी है?  या मां-बाप के संस्कार सदाचार नहीं है? कोई तो  कारण होगा ? यह कारण राष्ट्र के या राज्य के दायरे में आता है या दोनों के दायरे में नहीं आता? इस कारण की जिम्मेदारी किसकी है? कितनी भी पंचवार्षिक योजनाये बना लो, कितने ही मंदिर, विहार, चर्च और मस्जिद बना लो, यदि भारत के लोगों को सदाचार बनाने का कारखाना नहीं खोला जाता तो सभी विकास, हित और उससे सम्बंधित कार्य व्यर्थ है.

इस कार्य को अपने मुक्काम तक पहुंचाने के लिए बस एक ही सम्यक उपाय है, और वह है--

भारत के सभी राज्यों के सभी धर्मो के 10 -10 प्रतिनिधियों को  मिलकर एक COMMON PLATFORM बनाया जाये,  जिन प्रतिनिधियों की  संख्या लगभग 500  होना चाहिए.
इस COMMON PLATFORM  पर कोई धर्मंनीती, राजनीति , अर्थनीति, सामाजिकनीति   की चर्चा नहीं होगी.  

इस COMMON PLATFORM पर भारतीय लोगो के मन में  कैसे नफ़रत, क्रोध, लालच के बदले प्रेम, मैत्री, नम्रता, सहिष्णुता, सदाचार, का प्रशिक्षण दिया जाये-- इसके चर्चे भारत भर होना चाहिए और पर्चे भारत भर मे बांटना चाहिए. ये पर्चे स्कुल, कॉलेजेस, सभी केंद्रीय और राज्य कर्मचारियों को मिलाना चाहिए. यह कार्य तुरंत अंमल में आना चाहिए.  और यह कार्य नियमित रूप से बिना बाधा से, अखंड चलाना चाहिए. 

COMMON PLATFORM राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्य को सफल बनाने के लिए भारत के सिनेमा घरो में और टेलीविजन चैनल पर कम से कम एक वर्ष के लिए कोई भी मारपीट, खूनखराबा, बलात्कार, अत्याचार, अन्याय, चोरी, डकैती, लूटमार आदि दृश्यों पर रोक लगा दी जाये.  अच्छे उद्देश के लिए भारत के सभी संस्थाओं ने अपना-अपना सहकार्य देना चाहिए. यह कोई तानाशाह का आदेश नहीं है. यह तो भारत का लोकतंत्र और मजबूत बनाने का एक और नया- मार्ग है.जिसमे सभी लोकतान्त्रिक नागरिक भारतियों के योगदान की आज के अस्थिर और आतंकवाद के युग में नितांत आवश्यकता है. 

क्योंकि भारत के ही नहीं विश्व के सभी लोग और उनके देश असुरक्षित है. इसलिए भारत देश का यह सबसे प्रथम और महत्वपूर्ण कर्तव्य बनता है कि वह इस सम्यक कार्य के लिए नेतृत्व  करे. भारत का इतिहास गवाह है क़ि दो हजार वर्ष पूर्व सम्राट अशोक ने ऐसा ही नेतृत्व किया था और उनको इस कार्य के लिए सफलता और पहचान मिली थी जिसके कारण भारत का गौरव विश्व में फैला था और भारत ' सोने की चिड़िया ' के नाम से जाना जाता था. इतिहास गवाह है सम्राट अशोक के कार्य-काल में  प़ूरे भारत वर्ष में शांति और भाईचारे का माहौल था.

COMMON PLATFORM और कुछ नहीं सम्राट अशोक का वही पुराना लेकिन नए लोकतान्त्रिक अंदाज में भारत का एक पैगाम है. 

COMMON PLATFORM भारत का MANIFESTO है
COMMON PLATFORM भारत की जीवनशैली है.    
COMMON PLATFORM भारत का अप्रतिष्ठित चित्तं  है. 
अप्रतिष्ठित चित्तं 
एक अच्छा इन्सान बनाने के लिए चित्त को प्रतिष्ठित नहीं करना चाहिए.
चित्त और मन दोनों अलग अलग है.
चित्त में जब (१) वेदना, (२) संज्ञा, (३) संस्कार  और (४) विज्ञान  प्रतिष्ठित होते है तब तक संस्कारित मन, पुराना मन अज्ञान में रहता है, दुख में रहता है और लोगों को भी दुखी करता है. इसलिए भारत के ही नहीं विश्व  के लोग उदासीन और  दुखी है.
लेकिन जब चित्त में (१) वेदना (२) संज्ञा  (३) संस्कार और (४) विज्ञान  प्रतिष्ठित नहीं ( अप्रतिष्ठित चित्तं ) होते तब मानव एक अच्छा इन्सान बनता है. तब उत्पन्न नए मन में करुणा, प्रज्ञा, मैत्री, क्षमा, और शांति  उत्पन्न होती है. फिर यही नया - मन बिना बाधा से जग में मैत्रीपूर्ण व्यवहार करने लगता है और लोगों को मैत्रीपूर्ण व्यवहार करने की प्रेरणा देता है. COMMON PLATFORM का यही  तत्वज्ञान,प्रचार और प्रसार है.



Wednesday, 11 January 2012

JESUS CHRIST LIVED IN INDIA

  जीसस क्राइस्ट का भारत में शूद्रों को सन्देश 
बौध्द सम्राट मौर्य अशोक का जम्बुद्वीप-भारत पर इसवी  सन पूर्व 274  में  जब एकमेव शासन था.  तब उन्होंने अपने राज्याभिषेक के उत्सव पर अपने राजदूतों कों राजपत्रित आमन्त्रण पत्र देकर विश्व के सभी राजा महाराजाओं को आमंत्रित किया था. महास्थविर मोग्गली पुत्ततिस्सा जो सम्राट अशोक के गुरु थे उन्होंने सम्राट अशोक की सहायता से भारत से बहार फारस, यूनान, मिश्र, सीरिया, श्रीलंका, बर्मा आदि देशो में धर्म प्रचार करने के लिए बौध्द भिक्षु भेजे थे. (सदर्भ--ग्लिम्सेस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री)
विश्व  के बहुतांश राजा महाराजायें इस उत्सव में भाग लेने SILK ROAD से भारत में आये थे.
रोम देश के राजकुमार और उनके मंत्री भी आये थे.
इसवी सन पूर्व 44 में रोम सम्राट जुलिअस सीजर की हत्या की गई.
इसवी सन पूर्व 31 में क्लिओपात्रा रोम की Emperor-सम्राज्ञी बनी.
इसवी सन पूर्व 14 में AUGUSTUS रोम के सम्राट का निधन हुआ तब जीसस क्राइस्ट 14 वर्ष के थे. 
यीशु मसीहा का समय सम्राट अशोक के 250 वर्ष बाद का है.
रोम देश में जीसस क्राइस्ट के लोगों पर बहुत अत्याचार, बलात्कार और अन्याय हो रहा था. जब जीसस क्राइस्ट जवान हुए, तब उन्होंने अपने लोगों को संगठित करके एक क्रांति की. नतीजा यह हुआ की जीसस क्राइस्ट को अपने उम्र के 18 वे वर्ष में अपना देश छोड़ना पड़ा. यीशु भागकर यरुशलम शहर से व्यापारियों के साथ भारत के सिंध प्रान्त में आया.   
जीसस क्रिस्ट अपने मित्रों के साथ SILK ROAD से ल्हासा आये थे. जीसस क्राइस्ट ल्हासा, लदाख, तिबेट और नेपाल के हिमालय भागों में 12 वर्ष अभ्यास करते रहे. ईसा ने अपना विद्यार्थी जीवन कश्मीर की बौध्द गुफाओ में बिताया था.  उच्च शिक्षा पाकर जीसस अपने देश लौट आये. तब उनकी उम्र 29 वर्ष की थी. BIBLE में इस 12 वर्ष का जिक्र नहीं है. उम्र के 32  याने तिन  वर्षो तक जो आन्दोलन किया उससे उनके देश में जो विद्रोह हुआ, उस विद्रोह ने संपूर्ण रोम देश में एक परिवर्तन की लहर दौड़ आयी. जीसस के THE SERMON OF MOUNTAIN के प्रवचन ने और उसके बाद के प्रवचन ने THE BIBLE प्रकाशित हुआ. 
ईसा पर राजद्रोही होने का अभियोग चलाया गया था और इस अपराध में ही उसको फंसी मिली थी.
जीसस और उसके मित्रों को A.D. 29 को  CROSS पर लटकाया गया. वह दिन था FRIDAY. दुसरे दिन Saturday को रोम देश का उत्सव था, इसलिए जीसस को और उसके साथियों को वैसे ही सलीब पर छोड़कर सैनिक चले गए. जीसस और उनके साथियों को सलीब से उतारकर वे सभी कब्र की और चले गए. जीसस अभी तक जीवित थे. जब लोग उसकी कब्र पर आकर बड़ी हलचल करने लगे तब न्यायाधीश में उसके बेहोश (मृतक समजकर) शरीर को चुपके से कब्र से अलग दूर कर देना ही उचित समजा. फांसी देने के पूर्व यीशु को  अफीम दी गई थी ताकि वह अचेत रहे और गहरी नींद में सोते रहने से उन्हें कष्ट न हो. यीशु जीवित थे क्योंकि सलीब से उतरने के बाद भी उनके शरीर से खून बह रहा था.  
कुरान दृढ़ता से कहता है की यीशु मसीहा को क्रूस पर मरने से पहले बचा लिया गया.
जीसस के कहने पर उनको भारत लाया गया. 
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु लिखते हैं--" सारे मध्य एशिया में विशेष कर कश्मीर, लद्दाख और तिब्बत में बल्कि उत्तर दिशा से भी आगे यह विश्वास किया जाता है कि यीशु मसीह ने इन स्थानों कि यात्रा की थी.  
जीसस  उम्र के 80 वर्ष में  वे कुषाण राजवंश बौध्द सम्राट कनिष्क के राज्य में थे. कनिष्क शासन काल में गांधार कला और तक्षशिला विश्वविद्यालय ससार भर में प्रसिध्द थे. आपस में के मतभेदों को भुलाने के लिए कनिष्क ने एक बड़ी सभा बुलाई थी वह सभा श्रीनगर से 12 किलोमीटर दूर हरन नमक स्थान में बुलाई गई थी. इस सभा में 1500 बौध्द भिक्षु सम्मलित हुए थे. इसी काल में ललित विस्तार ग्रन्थ लिखा गया था. इस सभा याने तीसरी धम्म संगती का संचालन जीसस क्राइस्ट ने किया था. देखिये --होल्गर कर्स्टन की पुस्तक " Jisas  lived in India"  यीशु मसीह की मृत्यु 120  वर्ष की उम्र में कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के पास खानायारी नामक जगह पर हुई. आज भी यीशु की समाधी (कब्र ) यंहा पर है (सन्दर्भ - नोटोचिव  की पुस्तक)
(नोटोचिव का जन्म 25 अगस्त 1845 को रूस में हुआ था. सन 1887  में वे भारत की यात्रा पर आए थे.)
--- नोटोचिव मुस्लमान था. नोटोचिव लद्दाख की राजधानी लेह में गया और वंहा से हेमिस के प्रसिद्ध बुध्द 
     विहार में गया. वंहा पर उसने पूछा--" जिन धर्म ग्रंथो में यीशु के बारे में लिखा गया है वे कंहा से मिलेंगे?
--- नोटोचिव ने अपनी पुस्तक में लिखा --" यीशु जैन मत के अशुद्ध पुजारियों के पास नहीं रहा और उड़ीसा में 
     जगन्नाथ को चला गया. -----जगन्नाथ, राजगृह, बनारस और दुसरे तीर्थो में 6 वर्ष रहा. ---------
-----यीशु ने ब्राह्मणों की बात नहीं मानी और यीशु  वंहा से शूद्रों की तरफ चले गए. --------------------

     -------यीशु ने शूद्रों से कहा -- मूर्ति मत पूजो क्योंकि मूर्ति सुन नहीं सकती. वेदों को मत सुनो क्योंकि 
                इसमे सचाई नहीं है. गरीबो कि सहायता करो .निर्बल लोगों कि रक्षा करो. किसी का नुकसान मत  
                करो. -----------------------------------------------------------------------------------------------------------.
---यीशु के ऐसे प्रवचन सुनकर शूद्रों में एक संगठित चेतना जाग गई, इसका उलट यह परिणाम हुआ कि उस समय के मठाधिपतियों ने यीशु को जान से मारने कि धमकी दी. शूद्रों ने यीशु को वंहा से गुप्त रूप और मार्ग से हिमालय के लामा लोगों के पास छोड़ दिया. ---- 
( विस्तार के लिए पढ़िए--बरतानिया में बौध्द धर्म--लेखक --बी. आर. सावला )